अगर आप जमशेदपुर के किसी नुक्कड़ पर खडे हों और दो चार कॉलेज के छात्रों का जमावाडा हो तो कुछ इस तरह के वार्तालाप का आप रसास्वादन कर सकते हैं :
( दृश्य कुछ ऐसा है कि अचानक से कोई एकाध हफ्ते बाद एक सदस्य फिर से अड्डा पर आया है और बाकी सदस्य गण उनसे जिज्ञासा कर रहे हैं)-
"का बे कहाँ गिया रा तुम इतना दिन से, दिखाई नई पड़ रा था, हमलोक को तुम कुछ बताया भी नई रहा ..."
वापस आया सदस्य -
"अबे हम तो हियाँयी पर तो था, खट्टा और मोटा को तो बोला रा ना कि हम अपना चाचा का घर जाएगा उलियान बस्ती में "
खट्टा और मोटा जैसे व्यक्ति विशेष हर अड्डे में पाए जाते हैं, खट्टा अवश्य कोई दक्षिण भारतीय होगा, जिनके भोजन में खट्टा ज्यादा होने कि वजह से वैसा नाम और मोटा नामक सदस्य हर अड्डा में सबसे ज्यादा मोटा दिखने वाले सदस्य के लिए सुरक्षित रखा जाता था। ये बात अलग है कि एक बार नाम पड़ जाने के बाद मोटा अगर सूख के काँटा भी क्यों न हो जाये, वह मोटा के नाम से ही संबोधित होता रहेगा।
ऐसा पूछना अनिवार्य नही है क्यूंकि अब इसे बदला नही जा सकता है, ना ही पूछने वाले को कोई जिज्ञासा है परन्तु बात को आगे बढाने कि लिए ऐसा करना आवश्यक होता है, अतः पुनः एक और प्रश्न -
"का करने गिया रा बे तुम हुवां?"
जैसा प्रश्न, वैसा ही बेरुखी से दिया गया उत्तर, परन्तु लौटा सदस्य तुरंत काम की बातें करता है -
"कुछ नई बे, ऐसी बउत दिन हो गिया रा ना, तो चले गिया रा, और बता क्या हुआ इधर, कोई नया सामान दिखा क्या तेरे लोक को?"
"समान" से तात्पर्य सुन्दर लड़की से है, जो हमेशा अड्डा का एक प्रमुख चर्चा का विषय होता है। एक तो एक सदस्य की कमी और तिस पर दुखती रग पर रखा हाथ, परन्तु अपने दुःख को व्यक्त करता -
"का बे हियां पर तो तेरे को मालूम ही है कि बेटा एक भी अच्छा चीज़ नई है, साला एक ठो है भी तो बेटा उसका पैंतरा बौत है..."
लौटा हुआ सदस्य बहुत ही बेचैनी से अपनी एक नयी खोज को तुरंत अपने बाकी मंडली के सदस्यों को अवगत करना चाहता है -
"अबे सुन, तेरे को एक ठो नया खबर सुना रा, तुम लोक गिया रा न बंटी का भइवा का शादी का पार्टी में, वहाँ देखा रा न बे एक ठो सोलिट चीज़, वो बेटा फिर से नज़र आया रा मेरे को २४ नंबर रोड में ..."
बाकी सदस्यों कि बेचैनी बढ़ चुकी है और वो तुरंत जानना चाहते हैं -
"कहाँ पर बे, बता न...साला बौत सोलिट गेम रा बे... "
"मालूम नई किसका घर में रहता है पर बेटा उसका साथ में साला पूरा फिल्डिंग है बे"
"अबे वो बिहारी-बंगाली का घर का पीछे में एक ठो लाल बुल्लेट वाला घर देखा है न, उधरी किधर तो जाते देखा रा वो दिन..मगर साला साथ में एक ठो ढाबुट और एक ठो बेटा छक्का जैसा लौंडा भी रा..."
जमशेदपुर में जब मैं रहता था, उस वक़्त टीवी का प्रभाव जरा जरा सा दिखने लगा था, बावजूद उसके, हर मोहल्ले के मैदान में, या फिर अड्डा पर जो अक्सर सड़क के किसी कोने पर बने कलवट पर जिसे जमशेदपुर कि भाषा में "पुलिया" कहते हैं उस पर युवा पीढ़ी आसन्न मिलते थे जिन्हें लोग "पुलिया-तोड़" कह कर पुकारते थे। ऐसी बातों का सिलसिला अनवरत ऐसे ही चलता रहता है। अगर आप जमशेदपुर में रहे होंगे तो शायद ज्यादातर बातें आपको समझ में आ गयी होगी, पर अगर आप कभी नही रहे हैं तो प्रयास करने कि आवश्यकता नही है, कारण इसमे बहुत सारे शब्दों कि आपको विशेष अर्थ पहले समझना पड़ेगा ।
( दृश्य कुछ ऐसा है कि अचानक से कोई एकाध हफ्ते बाद एक सदस्य फिर से अड्डा पर आया है और बाकी सदस्य गण उनसे जिज्ञासा कर रहे हैं)-
"का बे कहाँ गिया रा तुम इतना दिन से, दिखाई नई पड़ रा था, हमलोक को तुम कुछ बताया भी नई रहा ..."
वापस आया सदस्य -
"अबे हम तो हियाँयी पर तो था, खट्टा और मोटा को तो बोला रा ना कि हम अपना चाचा का घर जाएगा उलियान बस्ती में "
खट्टा और मोटा जैसे व्यक्ति विशेष हर अड्डे में पाए जाते हैं, खट्टा अवश्य कोई दक्षिण भारतीय होगा, जिनके भोजन में खट्टा ज्यादा होने कि वजह से वैसा नाम और मोटा नामक सदस्य हर अड्डा में सबसे ज्यादा मोटा दिखने वाले सदस्य के लिए सुरक्षित रखा जाता था। ये बात अलग है कि एक बार नाम पड़ जाने के बाद मोटा अगर सूख के काँटा भी क्यों न हो जाये, वह मोटा के नाम से ही संबोधित होता रहेगा।
ऐसा पूछना अनिवार्य नही है क्यूंकि अब इसे बदला नही जा सकता है, ना ही पूछने वाले को कोई जिज्ञासा है परन्तु बात को आगे बढाने कि लिए ऐसा करना आवश्यक होता है, अतः पुनः एक और प्रश्न -
"का करने गिया रा बे तुम हुवां?"
जैसा प्रश्न, वैसा ही बेरुखी से दिया गया उत्तर, परन्तु लौटा सदस्य तुरंत काम की बातें करता है -
"कुछ नई बे, ऐसी बउत दिन हो गिया रा ना, तो चले गिया रा, और बता क्या हुआ इधर, कोई नया सामान दिखा क्या तेरे लोक को?"
"समान" से तात्पर्य सुन्दर लड़की से है, जो हमेशा अड्डा का एक प्रमुख चर्चा का विषय होता है। एक तो एक सदस्य की कमी और तिस पर दुखती रग पर रखा हाथ, परन्तु अपने दुःख को व्यक्त करता -
"का बे हियां पर तो तेरे को मालूम ही है कि बेटा एक भी अच्छा चीज़ नई है, साला एक ठो है भी तो बेटा उसका पैंतरा बौत है..."
लौटा हुआ सदस्य बहुत ही बेचैनी से अपनी एक नयी खोज को तुरंत अपने बाकी मंडली के सदस्यों को अवगत करना चाहता है -
"अबे सुन, तेरे को एक ठो नया खबर सुना रा, तुम लोक गिया रा न बंटी का भइवा का शादी का पार्टी में, वहाँ देखा रा न बे एक ठो सोलिट चीज़, वो बेटा फिर से नज़र आया रा मेरे को २४ नंबर रोड में ..."
बाकी सदस्यों कि बेचैनी बढ़ चुकी है और वो तुरंत जानना चाहते हैं -
"कहाँ पर बे, बता न...साला बौत सोलिट गेम रा बे... "
"मालूम नई किसका घर में रहता है पर बेटा उसका साथ में साला पूरा फिल्डिंग है बे"
"अबे वो बिहारी-बंगाली का घर का पीछे में एक ठो लाल बुल्लेट वाला घर देखा है न, उधरी किधर तो जाते देखा रा वो दिन..मगर साला साथ में एक ठो ढाबुट और एक ठो बेटा छक्का जैसा लौंडा भी रा..."
जमशेदपुर में जब मैं रहता था, उस वक़्त टीवी का प्रभाव जरा जरा सा दिखने लगा था, बावजूद उसके, हर मोहल्ले के मैदान में, या फिर अड्डा पर जो अक्सर सड़क के किसी कोने पर बने कलवट पर जिसे जमशेदपुर कि भाषा में "पुलिया" कहते हैं उस पर युवा पीढ़ी आसन्न मिलते थे जिन्हें लोग "पुलिया-तोड़" कह कर पुकारते थे। ऐसी बातों का सिलसिला अनवरत ऐसे ही चलता रहता है। अगर आप जमशेदपुर में रहे होंगे तो शायद ज्यादातर बातें आपको समझ में आ गयी होगी, पर अगर आप कभी नही रहे हैं तो प्रयास करने कि आवश्यकता नही है, कारण इसमे बहुत सारे शब्दों कि आपको विशेष अर्थ पहले समझना पड़ेगा ।
1 comments :
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Love Shayari
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