Thursday, December 13, 2007

जमशेदपुरिया : भाग ६

आज मैं जमशेदपुर मैं प्रयोग होने वाले कुछ विशिष्ट प्रकार के शब्दों का व्याख्यान करूँगा। ऐसा, मैं अनेक कारणों से, करना चाहता था। सबसे पहला कारण तो यह है कि मैं बचपन से इन शब्दों को सुनता आया हूँ, परन्तु आज तक, इन्हें कभी कहीं छपा या लिखा हुआ, नहीं देखा हूँ। और, अभी जब इसे मैं यहाँ टाइप करूँगा, तो मुझे उतनी ही सुखद अनुभूति होगी, जितना इसे देखने वाले मेरे साथियों को! इसलिए, और ज्यादा समय नहीं लेते हुए, मैं शुरू करना चाहता हूँ।

एक और कारण, यह है कि अगर किसी को जमशेदपुर जाना हो, तो इन शब्दों को जान कर उसका फायदा उठाएं क्योंकि वहाँ के बोलचाल में, इन शब्दों का खूब प्रयोग होता है - ऐसा मेरी अवधारणा है, अब की वस्तुस्थिति का मुझे ज्ञान नहीं है- पर आज से २० साल पहले तक, इसी तरह के शब्दों का प्रयोग करते हुए, लोग बातें किया करते थे:

चाट: सबसे पहले शुरुआत किया जाये शब्द "चाट" से!  जैसा कि शब्द "चाट" का शाब्दिक अर्थ से परिलक्षित होता है कि जैसे किसी खाने कि वस्तु को चाट कर खाना चाहिऐ। बचपन में "चाट" शब्द के वास्तविक अर्थ को समझने के पूर्व,  मैं चाट शब्द के दूसरे अर्थ को पहले समझ गया था। इसलिए, जब भी मैं किसी मेले या बाज़ार में, खोमचेवाले के ठेले के ऊपर - "मथुरा चाट" या "पप्पू चाट" जैसे नाम लिखा देखता था, मुझे मन ही मन बहुत हंसी आती थी। कारण, मुझे लगता था कि क्या पूरा मथुरा "चाट" होता है या फिर अगर पप्पू "चाट" है तो इस बात का इतना प्रचार करने की क्या जरुरत है? अब तक, शायद आपको थोड़ा-थोड़ा सा समझ में आने लगा होगा कि "चाट" का अर्थ क्या होता होगा? अतः और ज्यादा नहीं "चाटते" हुए मैं इसका दूसरा अर्थ बताता हूँ।
जब कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा सिरदर्द होता है, तो हम - जमशेदपुरिया में - उसे कहते हैं:
"उसने हमारे सिर को चाट लिया", और यहीं से "चाट" शब्द को जमशेदपुर के भाषा में वैसे हर लोगों के लिए सुरक्षित कर दिया गया जो सचमुच "चाट" यानि "सिरदर्द" होते हैं। 

खखोर: मगर, कोई "कड़ा मनुष्य", "चाट" से भी ऊपर के डिग्री का हो तो उसे हम "खखोर" कहते थे। जमशेदपुर में किसी चीज़ को खुरचने को "खखोरना" कहते हैं। वास्तविक है कि अगर कोई सिर चाटने से अगले डिग्री का काम यानि खुरचने का काम करे तो उसे "खखोर" कहना गलत नहीं होगा।

घनघोर: इसके अगले डिग्री के चाट को हम "घनघोर" कहते थे। "चाट", "खखोर" और फिर "घनघोर"।

झेलू: वैसे इसी से मिलता जुलता शब्द जो प्रयोग में आता है वह है "झेलू"। यानि किसी से अगर "चटना" हो, तो वह अपने आप में एक यातना होती है। जिसे "झेलना" पड़ता है वह "झेला" रहा है - और उसके कारक को "झेलू" कहना काफी तर्कसंगत है। वैसे "झेलू" से "झेल" और फिर "झेलंटिस" बन जाना जमशेदपुर की अपनी पहचान है।
"साला बंटी बहुत बड़ा झेलंटिस है, चाट चाट के साला बर्बाद कर दिया है"।
वैसे ऊपर के इस वाक्य में "बर्बाद" शब्द का प्रयोग, जमशेदपुरिया कि छटा बिखेर रही है।

नोट: हमारे ज़माने में, जमशेदपुर के हर पुलिया, अड्डे, या गप्प-गोष्ठी में, एक न एक "चाट", "झेलंटिस", "खखोर" या/और "घनघोर" अवश्य हुआ करता था।

भंजेड़ू : वैसे अगर ऐसे लोग हों तो "भंजेड़ू" जैसे व्यक्ति का अड्डे में होना भी लाज़मी होता था। इस वाक्य पर गौर कीजिए- जमशेदपुरिया - की छठा को बिखेरता वाक्य है:
"साला दीपक भांज भांज के खटिया खड़ा कर दिया रा, बहुत बड़ा भंजेड़ू है बेटा"।
खटिया खडा होना , मेरे ख्याल से, जमशेदपुरकी अपनी उपज है। मेरे समझ में, आज तक नहीं आया कि इसकी उत्पत्ति का क्या स्तोत्र हो सकता है।

घेरा : "भांजने" का पर्यायवाची शब्द है "घेरा देना"। वैसे घेरा शब्द को मैं लक्ष्मण या "लक्खन" के साथ बहुत रोचक ढंग से प्रयोग होते सुना है।

"अबे मेरा गाँव में हमलोक का एक बहुत बड़ा महल है, मेरा दादाजी तो वहाँ का राजा रा न.."
"बेटा, ये तो पूरा "लक्खन घेरा" है..."

वैसे, जहाँ लक्ष्मण हों, वहाँ राम का होना भी आवश्यक है। अतः, जब बात कुछ ज्यादा ही आगे कि हो जाये, तो वैसे अवसर के लिए "राम घेरा" को प्रयोग  सुरक्षित रखा जाता था।

ऐसे ही विचार को व्यक्त करने के लिए "हवा देना", "गैस देना", "छोड़ना" या सिर्फ "देना" भी काफी उपयुक्त हैं।
"अबे ज्यादा हवा मत दे, हम सब समझ रा"।
"का बे हमलोक को धूर  समझ के रक्खा है क्या? तभी सेदिए  जा रा"
"ज्यादा गैस मत दे, बहुत बर्दाश्त कर लिया तेरे को"
"बेटा, आज मोहन अपना चाचा के बारे में बहुत छोड़ रा था..."

ऊपर लिखे वाक्य, वैसे लोगों के लिए है, जो कुछ ज्यादा बोल जाते हैं। कुछ लोगों की, वैसे आदत सी होती है, किसी भी बात को कुछ ज्यादा बढ़ा चढा के कहने की।

Tuesday, December 11, 2007

जमशेदपुरिया : भाग ५

अपने पिछले ब्लाग में, मैंने अपने बचपन की चर्चा की थी। हमारे बचपन में, ज्यादा कुछ करने को नही होता था। फलस्वरूप, हम स्वयं बहुत तरह के -"समयाकाटू" तरीकों का - अनुसंधान करते रहते थे।

इस क्रम में खास कर, सर्दी और गर्मियों की छुट्टियाँ बहुत उपयुक्त होते थे। गर्मियों कि छुट्टियों में, ज्यादातर बिहारी परिवार का, गाँव जाने का प्रचलन काफी आम था। और, ये आम-बात, वास्तव में "आम" के लिए ही होता था। ऐसा कोई अचानक से, "ग्राम-प्रेम" छलकने जैसे कारणों से नही होता था, बल्कि शहर में ठूंस-ठूंस कर खाने के बाद भी, अपने गाँव में रहने वाले बाक़ी परिवार के सदस्यों को अपने पुश्तैनी आम के बागीचे का उपभोग करते देखना, लोगो को गंवारा नहीं होता था। फलतः, सपरिवार गाँव के आम का बँटवारा और अपने हिस्से से बटोर कर लाने जाते थे।

हालांकि, गाँव जाने की प्रथा, दक्षिण भारतीयों में भी होता था। मगर बिहारी अपने गाँव जाने के बारे में कहता था कि "हम अपना गाँव जा रा एक महीना के लिए"
दक्षिण भारतीय कहते थे कि " हमलोकोन अपना "देस" जा रा"
बंगाली कहते थे " हमलोकोन अपना बाड़ी जा रहा है"।

जैसा  मैंने पूर्व के ब्लॉग में, पहले भी बताया है कि जमशेदपुर में, एक ही बात को कहने के बहुत सारे अलग अलग-अंदाज़, होते थे। और, मजे की बात ये है कि कुछेक शब्दों के प्रयोग करने वाले के मातृभाषा का, हमें ज्ञान हो जाता था। गाँव, देस, बाड़ी या किसी भी और शब्दों का प्रयोग हो, अंततः, समझने वाले को कोई खास परेशानी नहीं होती थी।

 जब मैं पहली बार कनाडा और अमेरिका में आया, तो हमें, कभी भी प्रवासियों के बीच रहने में कोई खास दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा। इसका कारण यह था कि जमशेदपुर में, वैसे ही अनेकों प्रान्त से आये लोगों के पले-बढे होने के कारण - विदेश में भी भारत के अनेकों प्रान्त से बसे प्रवासियों के बीच रहने जैसे माहौल की, पहले से ही आदत थी।

हालांकि, हमें बचपन में, अलग अलग प्रान्त से आये जमशेदपुर के मित्रों की कहानियाँ मिलती जुलती लगती थी और हर कोई का एक सूत्र टाटा से जुड़ा सा होता था- परन्तु इतने सालों के बाद भी, हर किसिस की अपनी विविधतायें और विशेष प्रकार के रीते रिवाज या भाषा का प्रभाव दिख ही जाता था।

Monday, December 10, 2007

जमशेदपुरिया : भाग ४

जमशेदपुर के गर्मी के एक दोपहर की झलक - गर्मी-छुट्टी का समय, स्कूल बंद, जून के गर्मी के दिन की  तपती दोपहरिया का समय, लू के थपेड़ो से बचने के लिए लोग मुंह में गमछे को बाँध कर - जो जरा पैसे वाले हैं- काले चश्मा को लगाये, साइकल या किसी प्रकार के दोपहिये- स्कूटर या मोटरसाइकल को चलाते,  कुछ ६ बजे वाली शिफ्ट का काम ख़त्म करके प्लांट से आते और कुछ २ बजे शिफ्ट के काम पर जाते हुए, सड़क के पिघले अलकतरे पर- टायर के - फट-फट करती आवाज, सामने के पेड़ के धूप-छाँव से छन-छन कर, रूक-रुक कर गर्मी से राहत मांगती हुयी - कोयल की रुंधती हुयी आवाज, दूर गली में ऊंची आवाज़ में सामान के बारे में चिल्ला कर फेरी लगाता हुआ - गर्मी के विरल वातावरण में - आवाज दूर -दूर तक गूंजती सी, थके-हारे कुत्ते कहीं किसी पेड़ के छाये में पनाह लेते हुए से - और, घर में कोई काम न होने के कारण- किसी मोहल्ले के आस-पास के दोस्त के पास पहुँच कर, होते हुए कुछ ऐसे संवादों का सिलसिला-
" अबे गिरी फिरिज़ का ठंडा पानी पिला न बे..."
" बेटा फिरिज का सब पानी खतम हो गिया है, सरकारी माल समझ के रक्खा है, क्या बे? "
" अबे दे न यार, अच्छा चल एक ठो बोतल ले आ न , उसी में काम हो जाएगा बे.."
"बेटा, अभी तेरे को देगा, तो उधर से बडकू, कृष्णा और पूरा गेंग आ जाएगा, समझा न ?"
"अरी बेटा, आज बहुत्त भाव खा रा बे, नई देखेगा बड़कू लोकोन , अबे ला न, साइड में खड़ा हो के हमलोक पी लेगा...बेटा, आज तुम बड़ी पैंतरा ले रा बे, मालूम, मेरे पास वेताल का नया वाला कॉमिक्स आ गिया है, समझा न.."
" सही में बे? रूक, रुक.... अभी..ले के आ रा बे... हम अभी पानी ले के आ रा है बे..... "
मेरा बचपन - कुछ इसी तरह का होता था और इस तरह के वार्तालाप, मेरे बचपन के किसी पुराने कैसेट का पुनर्प्रसारण जैसा कार्यक्रम है।

अगर आपने इस वार्तालाप को समझने कि कोशिश की होगी, तो भाषा के अलावा, शायद कुछ तथ्य आपके नहीं पल्ले पड़ा होगा। अतः, मुझे कुछेक बातों का यहाँ उल्लेख करना पड़ेगा।

हमारे बचपन में सबों के घर में फ्रीज़ नही होता था। और, जिनके घर में होता था, गर्मी के छुट्टियों में, हम लोगों का उनके घर में चींटियों की तरह, ताँता लगा रहता था। पानी के बोतल को भरते रहने के साथ-साथ, हम फ्रीज़ की क्षमता का भी हम ख्याल नहीं करते थे। जिस दोस्त के घर ऐसा कोई उपकरण होता था, लाजमी है - उसका "पैंतरा" हमें झेलना पड़ता था बचपन से ही हमारा "nigotiation स्किल" और "persuasion स्किल" जैसे कठिन गुणों का प्रादुर्भाव होने लगा था।

टीवी या किसी और अन्य मनोरंजन के अभाव में, इन्द्रजाल कॉमिक्स, हमारा आज के युग के विडियो गेम्स या कार्टून चैनल्स का प्रतिद्वंदी होता था। वेताल, मैँडिॅक, बहादुर, फ्लैश गार्डन आदि जैसे लीड characters हमारे पसंदीदा नायक होते थे। वेताल के सारे परिवार के विषय पर, हम घंटों तक गोष्ठी चला सकते थे। चाहे वो गार्थ नामक अजीबोगरीब चरित्र हो - जो हमेशा "गुच्छियाँ" खाता रहता था, या फिर वेताल का घोड़ा - तूफ़ान हो, वेताल का खोपड़ीनुमा गुफा हो - या फिर उसकी प्रेयसी डायना और दत्तक पुत्र रेक्स हो - हम बडे चाव से उनको पढ़ते हुए - उस कॉमिक्स के पूरे ताने-बुने में उलझे से रहते थे।

टीवी न होने के साथ-साथ, उस जमाने में न कोई FM रेडियो होता था, और न ही कोई स्थानीय रेडियो स्टेशन होता था - जहाँ से, हम मनोरंजन के लिए किसी तरह का गाना सुन सकते थे। ऐसे अभाव के दिनों में, कुछ लोगों के घर पर रेकॉर्ड-प्लेयर हुआ करता था। हम बडे जतन से, चोरी -छिपे, वैसे किसी के घर पर - जब उनके घर कोई अभिभावक न हो- वैसे वक्त पर, पहुंच जाते और इत्मीनान से अपने पसंदीदा गाने सुनते थे। गाना कोई सा भी हो - अपने नियंत्रण में रखते हुए - गाना को बजाना, और उसके पीछे की तकनीक का अनुभव, एक बहुत ही आनंददायक अनुभव होता था।

उस ज़माने में, हमारे मोहल्ले की महिलाएं - चाचियाँ, भाभियाँ, माएं, फिक्स्ड डिपाजिट में बची-खुची सूद समेत वाली दादियाँ और नानियाँ - सब के सब दोपहर के समय सम्पूर्ण रूप से खाली बैठी होती थी। उनका सबसे प्रिय काम होता था - एक दूसरे के घर घूमने जैसा "समयकाटू" कार्यक्रम। हर महिला, या तो किसी मोहल्ले की महिला-सभा में शरीक होते थे अथवा अपने ही घर पर जमघट का प्रयोजन करते थे।

ऐसे कार्यक्रमों के तहत, बारी-बारी से किसी एक के घर पर - जिनको अक्सर हम सभी मास्टरनी या मुखियाइन की उपाधि दे दिया करते थे - मोहल्ले के - एक गुट की महिलाओं का, जमघट सा हो जाया करता था। वैसे जमघट में, किसी खास प्रकार के जटिल या विस्तृत आयोजन करने की कोई प्रथा नही होता था। बल्कि, गर्म चाय की, या फिर ठन्डे में - नीम्बू, शक्कर और घडे के पानी को मिला कर - "शरबत" पिलाने का ज्यादा प्रचालन था। शरबत, अक्सर बड़े से जग में, घोल कर बनाया जाता था। शक्कर घोलने का कार्यक्रम बहुत रोचक सा होता था। खास कर दूध के पतीले और जग में फेंटने का कार्यक्रम बहुत मज़ेदार होता था। उस क्रम में, पानी और शक्कर के घोल का छलक जाना बहुत सामान्य सी बात होती थी। जिसके आधे घंटे बाद, चहरों ओर बड़ी-बड़ी काली चींटियों का भ्रमण...! ऐसा लग रहा है, मानो मैं अभी समय के उस काल में वापस चला गया हूँ, और शरबत बना रहा हूँ!

एक और खास बात जो होता था वो है कि शरबत एक जग में और गिलास हाथ में लिए हम शरबत पिलाने जाते थे। अब तक तो ठीक है, आगे सुनिए।

बारी बारी से हरेक व्यक्ति के हाथ में शरबत का गिलास दिया जाता था। जिसको मिलता था वह इस तरह से शरबत के गिलास को हाथ में पकडते थे, मानो उन्हें अब आगे कोई काम सा करना हो - इस लिए गट्ट-गट्ट की आवाज करते हुए शरबत उसे खतम करना होता था। पीने वाले के पीने कि प्रक्रिया को अगली बारी आने वाले लोग बड़ी कातर दृष्टि से देखते रहते थे। वैसे गिद्ध नज़रों के पैनेपन के बीच शरबत के एक एक चुस्की का रसास्वादन करना बहुत जोखिम भरा काम होता था। अतः ज्यादातर लोग गटागट पद्धति का पालन करते थे। इसके बाद जूठे गिलास को शरबत से ही धोया जाता था, इतने आतिथ्य के बीच में अनेक सारे गिलासों को लाना या अलग से एक और जग में पानी लाना और उस से गिलास को धोने जैसा जटिल प्रक्रिया का सरलीकरण कर दिया गया था।

चूँकि शरबत से ही जूठे गिलास को साफ़ करने का कार्यक्रम होता था - जाहिर है, इस प्रक्रिया में शरबत का कम से कम ही नुकसान हो, इस खास बात का ख्याल रखते हुए गिलास धोने जैसे कार्य को भी काफी कंजूसी के साथ - कम से कम में काम चला कर यथोचित कर दिया जाता था।

परन्तु लोग भी शरबत पीने के कार्यक्रम को "आम से मतलब रखो और गुठली मत गीनो" के भावना से अधकचरे ढंग से धोये गिलास में ग्रहण करने को तैयार से होते थे। उनकी भावना सर्वथा यह होती थी कि - "व्यक्ति के बाहरी रूप पर नही बल्कि उनके अन्तःगुण पर जाओ"। शरबत को ग्रहण कर वे इस तरह के सारगर्भित विचारों को चरितार्थ करते थे। अतः, बिना किस और विचार के कि पिछला पीने वाला, आम के दातून से या नीम के दातून से दांत धोता हो, या टूथपेस्ट का इस्तेमाल करता हो, या फिर टूथ-ब्रश को - कागज के टुकडे में निकाले विको-वज्रदंती पाउडर - में ब्रश को छुआते हुए दाांत को साफ़ करता हो, ऐसे तुच्छ विचारों से वे ऊपर उठकर, चाणक्य नीति में बताये - "चांडालों से भी ज्ञान अर्जन में संकोच नही करना चाहिऐ" - ऐसे विचारों के अधीन होकर, बड़ी तत्परता से "गटागट शैली" में पूरे के पूरे गिलास के शर्बत को ग्रहण कर लेता था।