Monday, December 10, 2007

जमशेदपुरिया : भाग ४

जमशेदपुर के गर्मी के एक दोपहर की झलक - गर्मी-छुट्टी का समय, स्कूल बंद, जून के गर्मी के दिन की  तपती दोपहरिया का समय, लू के थपेड़ो से बचने के लिए लोग मुंह में गमछे को बाँध कर - जो जरा पैसे वाले हैं- काले चश्मा को लगाये, साइकल या किसी प्रकार के दोपहिये- स्कूटर या मोटरसाइकल को चलाते,  कुछ ६ बजे वाली शिफ्ट का काम ख़त्म करके प्लांट से आते और कुछ २ बजे शिफ्ट के काम पर जाते हुए, सड़क के पिघले अलकतरे पर- टायर के - फट-फट करती आवाज, सामने के पेड़ के धूप-छाँव से छन-छन कर, रूक-रुक कर गर्मी से राहत मांगती हुयी - कोयल की रुंधती हुयी आवाज, दूर गली में ऊंची आवाज़ में सामान के बारे में चिल्ला कर फेरी लगाता हुआ - गर्मी के विरल वातावरण में - आवाज दूर -दूर तक गूंजती सी, थके-हारे कुत्ते कहीं किसी पेड़ के छाये में पनाह लेते हुए से - और, घर में कोई काम न होने के कारण- किसी मोहल्ले के आस-पास के दोस्त के पास पहुँच कर, होते हुए कुछ ऐसे संवादों का सिलसिला-
" अबे गिरी फिरिज़ का ठंडा पानी पिला न बे..."
" बेटा फिरिज का सब पानी खतम हो गिया है, सरकारी माल समझ के रक्खा है, क्या बे? "
" अबे दे न यार, अच्छा चल एक ठो बोतल ले आ न , उसी में काम हो जाएगा बे.."
"बेटा, अभी तेरे को देगा, तो उधर से बडकू, कृष्णा और पूरा गेंग आ जाएगा, समझा न ?"
"अरी बेटा, आज बहुत्त भाव खा रा बे, नई देखेगा बड़कू लोकोन , अबे ला न, साइड में खड़ा हो के हमलोक पी लेगा...बेटा, आज तुम बड़ी पैंतरा ले रा बे, मालूम, मेरे पास वेताल का नया वाला कॉमिक्स आ गिया है, समझा न.."
" सही में बे? रूक, रुक.... अभी..ले के आ रा बे... हम अभी पानी ले के आ रा है बे..... "
मेरा बचपन - कुछ इसी तरह का होता था और इस तरह के वार्तालाप, मेरे बचपन के किसी पुराने कैसेट का पुनर्प्रसारण जैसा कार्यक्रम है।

अगर आपने इस वार्तालाप को समझने कि कोशिश की होगी, तो भाषा के अलावा, शायद कुछ तथ्य आपके नहीं पल्ले पड़ा होगा। अतः, मुझे कुछेक बातों का यहाँ उल्लेख करना पड़ेगा।

हमारे बचपन में सबों के घर में फ्रीज़ नही होता था। और, जिनके घर में होता था, गर्मी के छुट्टियों में, हम लोगों का उनके घर में चींटियों की तरह, ताँता लगा रहता था। पानी के बोतल को भरते रहने के साथ-साथ, हम फ्रीज़ की क्षमता का भी हम ख्याल नहीं करते थे। जिस दोस्त के घर ऐसा कोई उपकरण होता था, लाजमी है - उसका "पैंतरा" हमें झेलना पड़ता था बचपन से ही हमारा "nigotiation स्किल" और "persuasion स्किल" जैसे कठिन गुणों का प्रादुर्भाव होने लगा था।

टीवी या किसी और अन्य मनोरंजन के अभाव में, इन्द्रजाल कॉमिक्स, हमारा आज के युग के विडियो गेम्स या कार्टून चैनल्स का प्रतिद्वंदी होता था। वेताल, मैँडिॅक, बहादुर, फ्लैश गार्डन आदि जैसे लीड characters हमारे पसंदीदा नायक होते थे। वेताल के सारे परिवार के विषय पर, हम घंटों तक गोष्ठी चला सकते थे। चाहे वो गार्थ नामक अजीबोगरीब चरित्र हो - जो हमेशा "गुच्छियाँ" खाता रहता था, या फिर वेताल का घोड़ा - तूफ़ान हो, वेताल का खोपड़ीनुमा गुफा हो - या फिर उसकी प्रेयसी डायना और दत्तक पुत्र रेक्स हो - हम बडे चाव से उनको पढ़ते हुए - उस कॉमिक्स के पूरे ताने-बुने में उलझे से रहते थे।

टीवी न होने के साथ-साथ, उस जमाने में न कोई FM रेडियो होता था, और न ही कोई स्थानीय रेडियो स्टेशन होता था - जहाँ से, हम मनोरंजन के लिए किसी तरह का गाना सुन सकते थे। ऐसे अभाव के दिनों में, कुछ लोगों के घर पर रेकॉर्ड-प्लेयर हुआ करता था। हम बडे जतन से, चोरी -छिपे, वैसे किसी के घर पर - जब उनके घर कोई अभिभावक न हो- वैसे वक्त पर, पहुंच जाते और इत्मीनान से अपने पसंदीदा गाने सुनते थे। गाना कोई सा भी हो - अपने नियंत्रण में रखते हुए - गाना को बजाना, और उसके पीछे की तकनीक का अनुभव, एक बहुत ही आनंददायक अनुभव होता था।

उस ज़माने में, हमारे मोहल्ले की महिलाएं - चाचियाँ, भाभियाँ, माएं, फिक्स्ड डिपाजिट में बची-खुची सूद समेत वाली दादियाँ और नानियाँ - सब के सब दोपहर के समय सम्पूर्ण रूप से खाली बैठी होती थी। उनका सबसे प्रिय काम होता था - एक दूसरे के घर घूमने जैसा "समयकाटू" कार्यक्रम। हर महिला, या तो किसी मोहल्ले की महिला-सभा में शरीक होते थे अथवा अपने ही घर पर जमघट का प्रयोजन करते थे।

ऐसे कार्यक्रमों के तहत, बारी-बारी से किसी एक के घर पर - जिनको अक्सर हम सभी मास्टरनी या मुखियाइन की उपाधि दे दिया करते थे - मोहल्ले के - एक गुट की महिलाओं का, जमघट सा हो जाया करता था। वैसे जमघट में, किसी खास प्रकार के जटिल या विस्तृत आयोजन करने की कोई प्रथा नही होता था। बल्कि, गर्म चाय की, या फिर ठन्डे में - नीम्बू, शक्कर और घडे के पानी को मिला कर - "शरबत" पिलाने का ज्यादा प्रचालन था। शरबत, अक्सर बड़े से जग में, घोल कर बनाया जाता था। शक्कर घोलने का कार्यक्रम बहुत रोचक सा होता था। खास कर दूध के पतीले और जग में फेंटने का कार्यक्रम बहुत मज़ेदार होता था। उस क्रम में, पानी और शक्कर के घोल का छलक जाना बहुत सामान्य सी बात होती थी। जिसके आधे घंटे बाद, चहरों ओर बड़ी-बड़ी काली चींटियों का भ्रमण...! ऐसा लग रहा है, मानो मैं अभी समय के उस काल में वापस चला गया हूँ, और शरबत बना रहा हूँ!

एक और खास बात जो होता था वो है कि शरबत एक जग में और गिलास हाथ में लिए हम शरबत पिलाने जाते थे। अब तक तो ठीक है, आगे सुनिए।

बारी बारी से हरेक व्यक्ति के हाथ में शरबत का गिलास दिया जाता था। जिसको मिलता था वह इस तरह से शरबत के गिलास को हाथ में पकडते थे, मानो उन्हें अब आगे कोई काम सा करना हो - इस लिए गट्ट-गट्ट की आवाज करते हुए शरबत उसे खतम करना होता था। पीने वाले के पीने कि प्रक्रिया को अगली बारी आने वाले लोग बड़ी कातर दृष्टि से देखते रहते थे। वैसे गिद्ध नज़रों के पैनेपन के बीच शरबत के एक एक चुस्की का रसास्वादन करना बहुत जोखिम भरा काम होता था। अतः ज्यादातर लोग गटागट पद्धति का पालन करते थे। इसके बाद जूठे गिलास को शरबत से ही धोया जाता था, इतने आतिथ्य के बीच में अनेक सारे गिलासों को लाना या अलग से एक और जग में पानी लाना और उस से गिलास को धोने जैसा जटिल प्रक्रिया का सरलीकरण कर दिया गया था।

चूँकि शरबत से ही जूठे गिलास को साफ़ करने का कार्यक्रम होता था - जाहिर है, इस प्रक्रिया में शरबत का कम से कम ही नुकसान हो, इस खास बात का ख्याल रखते हुए गिलास धोने जैसे कार्य को भी काफी कंजूसी के साथ - कम से कम में काम चला कर यथोचित कर दिया जाता था।

परन्तु लोग भी शरबत पीने के कार्यक्रम को "आम से मतलब रखो और गुठली मत गीनो" के भावना से अधकचरे ढंग से धोये गिलास में ग्रहण करने को तैयार से होते थे। उनकी भावना सर्वथा यह होती थी कि - "व्यक्ति के बाहरी रूप पर नही बल्कि उनके अन्तःगुण पर जाओ"। शरबत को ग्रहण कर वे इस तरह के सारगर्भित विचारों को चरितार्थ करते थे। अतः, बिना किस और विचार के कि पिछला पीने वाला, आम के दातून से या नीम के दातून से दांत धोता हो, या टूथपेस्ट का इस्तेमाल करता हो, या फिर टूथ-ब्रश को - कागज के टुकडे में निकाले विको-वज्रदंती पाउडर - में ब्रश को छुआते हुए दाांत को साफ़ करता हो, ऐसे तुच्छ विचारों से वे ऊपर उठकर, चाणक्य नीति में बताये - "चांडालों से भी ज्ञान अर्जन में संकोच नही करना चाहिऐ" - ऐसे विचारों के अधीन होकर, बड़ी तत्परता से "गटागट शैली" में पूरे के पूरे गिलास के शर्बत को ग्रहण कर लेता था।

0 comments :