Thursday, November 22, 2007

जमशेदपुरिया - भाग ३

जमशेदपुर के लोगों के बारे में, मैंने तो पहले भी जिक्र किया है कि यह अपने आप में एक "सूक्ष्म भारत " है। हर प्रांत के लोग, यहाँ बहुत गर्व के साथ - जमशेदपुर-परिवार - की भावना के साथ रहते हैं। मैं जमशेदपुर में ही जन्मा हूँ और अपने शुरू के करीब ३० साल वहीं गुजारा हूँ। विगत ९ सालों से जमशेदपुर से अलग हूँ, पर शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता होगा, जब मैंने जमशेदपुर के बारे में नहीं सोचा होगा। मैंने जमशेदपुर में गुजारे, अपने कई सालों के अनुभव में, कभी ये नहीं पाया कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वो किसी भी प्रांत का हो, खुद को जमशेदपुर का नही मानता होगा।

वस्तुतः जमशेदपुर अपने आप में कुछ नहीं है बल्कि लोगों ने जमशेदपुर को एक शहर बनाया है। मैं जरा सा दार्शनिक सा लगूँगा पर जमशेदपुर के निर्माता श्री जमशेद जी नौसरवान टाटा ने शायद ऐसे ही शहर कि कल्पना कि थी और उसकी नींव आज से करीब सौ साल पहले डाली थी। लोग बड़े गर्व से कहते हैं कि वे जमशेदपुर के हैं। जमशेदपुरिया में इसी को कहेंगे - "हमलोकोन का जमशेदपुर"।

मैं अभी ६ महीने पहले जब जमशेदपुर में था, उस वक़्त अचानक से मुझे जमशेदपुर में काफी सारी कमियां या यूं कहिये उसके छोटे होने का अथवा समय के साथ शहर में आधुनिकतम सुविधाओं की कमी कह लीजिये, ऐसा लगने लगा। मगर जब मैं अपने वैसे दोस्तों से जो मेरे साथ टिस्को में अपना जॉब शुरू किये थे और अभी तक कार्यरत हैं, उन सबों ने उन्मुक्त भाव से मुझे अनेकानेक शब्दों और दलीलों से ये समझाने की भरसक कोशिशें की कि जमशेदपुर में वो सब सुविधाएं हैं जो होनी चाहिऐ। हालांकि ऐसा मैंने हर शहर में जब लोगों से मुलाक़ात की तो लोगों ने अपने शहर कि वैसी ही तारीफें की, बल्कि लोगों ने तो शहरों की कमियों को भी उसकी खासियत में तब्दील कर दिया - जैसे "छोटे शहर का एक फायदा है कि सब दुकानें और ऑफिस काफी करीब करीब होते हैं", परन्तु बताने वाले ये भूल गए कि उसके कारण यातायात की असुविधाएं और पार्किंग कि जगहों का न मिल पाना एक भयंकर समस्या बन गयी है। परन्तु मैंने  जब ऐसी बातें अपने दोस्तों से सूनी तो मुझे एक सुखद आश्चर्य हुआ कि जमशेदपुर में काम करने आने के पहले वी सब जमशेदपुर से बिल्कुल अनजान थे और ८-९ सालों में जमशेदपुर के वो बन गए ये एक अपने आप में अचरज की बात थी। मैं इस सोच में डूब गया कि कोई तो बात है जमशेदपुर में की यहाँ जो भी आया, वो ज्यादातर यहीं का हो जाता है, हालांकि आज के जमाने में जमशेदपुर जैसे शहर से ज्यादा चकाचौंध और सुविधाओं से भरी कितने सारे महानगर हैं, पर आज भी लोग यहीं रहना चाहते हैं। शायद ऐसे ही कारणों से हमारे और बाकी कई और परिवारों के पूर्वजों ने अपने अपने गाँवों या अन्य शहरों को छोड़ इस शहर को अपना घर बना लिया।

जमशेदपुर कि जो सबसे खास बात है वो है यहां की अनेक प्रकार की सुविधाएं। जमशेदपुर में खेल हो या पढाई, स्वच्छता की बात हो या नवीनतम सुविधाएं। हाल के दिनों तक जमशेदपुर कई मामले में देश के बाकी हिस्सों से काफी आगे रहता था। मसलन, हवाई उड्डयन शिक्षण केन्द्र या वृन्दावन के तर्ज पर जुबिली पार्क। पढाई के क्षेत्र में भी यह बाकी शहरों से काफी आगे रह चुकी है। इंजीनियरिंग, मेडिकल एवं उच्च शिक्षाओं के साथ साथ XLRI जैसे शिक्षा केन्द्र में प्रबंधन के क्षेत्र में शिक्षा की शुरुआत करना शायद जमशेद्पुर के नींव में टाटा प्रबंधन के सहयोग का स्वर्णिम उपलब्धि मानना पड़ेगा। हिंदी , अंग्रेजी माध्यम से ले कर करीब करीब हर क्षेत्रीय भाषाएं जैसे बंगला, उर्दू, उड़िया आदि में भी मैंने शिक्षण संस्थानों को देखा है। हालांकि आज के दिनों में शायद ही कोई अंग्रेज़ी के अलावा किसी और भाषा में शिक्षा के बारे में सोचता होगा, और शायद इस कारण से बाकी माध्यम लगभग बंद हो चुके हैं। मैं अपने आप को बहुत भाग्यशाली मानता हूँ की मेरी शिक्षा हिंदी माध्यम से हुई है और मेरी हिंदी इतनी प्रखर बनी वर्ना मैं एक बहुत ही बहुमूल्य धरोहर से वंचित रह जाता।

Tuesday, November 20, 2007

जमशेदपुरिया - भाग २

अगर आप जमशेदपुर के किसी नुक्कड़ पर खडे हों और दो चार कॉलेज के छात्रों का जमावाडा हो तो कुछ इस तरह के वार्तालाप का आप रसास्वादन कर सकते हैं :
( दृश्य कुछ ऐसा है कि अचानक से कोई एकाध हफ्ते बाद एक सदस्य फिर से अड्डा पर आया है और बाकी सदस्य गण उनसे जिज्ञासा कर रहे हैं)-
"का बे कहाँ गिया रा तुम इतना दिन से, दिखाई नई पड़ रा था, हमलोक को तुम कुछ बताया भी नई रहा ..."
वापस आया सदस्य -
"अबे हम तो हियाँयी पर तो था, खट्टा और मोटा को तो बोला रा ना कि हम अपना चाचा का घर जाएगा उलियान बस्ती में "

खट्टा और मोटा जैसे व्यक्ति विशेष हर अड्डे में पाए जाते हैं, खट्टा अवश्य कोई दक्षिण भारतीय होगा, जिनके भोजन में खट्टा ज्यादा होने कि वजह से वैसा नाम और मोटा नामक सदस्य हर अड्डा में सबसे ज्यादा मोटा दिखने वाले सदस्य के लिए सुरक्षित रखा जाता था। ये बात अलग है कि एक बार नाम पड़ जाने के बाद मोटा अगर सूख के काँटा भी क्यों न हो जाये, वह मोटा के नाम से ही संबोधित होता रहेगा।

ऐसा पूछना अनिवार्य नही है क्यूंकि अब इसे बदला नही जा सकता है, ना ही पूछने वाले को कोई जिज्ञासा है परन्तु बात को आगे बढाने कि लिए ऐसा करना आवश्यक होता है, अतः पुनः एक और प्रश्न -
"का करने गिया रा बे तुम हुवां?"
जैसा प्रश्न, वैसा ही बेरुखी से दिया गया उत्तर, परन्तु लौटा सदस्य तुरंत काम की बातें करता है -
"कुछ नई बे, ऐसी बउत दिन हो गिया रा ना, तो चले गिया रा, और बता क्या हुआ इधर, कोई नया सामान दिखा क्या तेरे लोक को?"

"समान" से तात्पर्य सुन्दर लड़की से है, जो हमेशा अड्डा का एक प्रमुख चर्चा का विषय होता है। एक तो एक सदस्य की कमी और तिस पर दुखती रग पर रखा हाथ, परन्तु अपने दुःख को व्यक्त करता -
"का बे हियां पर तो तेरे को मालूम ही है कि बेटा एक भी अच्छा चीज़ नई है, साला एक ठो है भी तो बेटा उसका पैंतरा बौत है..."

लौटा हुआ सदस्य बहुत ही बेचैनी से अपनी एक नयी खोज को तुरंत अपने बाकी मंडली के सदस्यों को अवगत करना चाहता है -
"अबे सुन, तेरे को एक ठो नया खबर सुना रा, तुम लोक गिया रा न बंटी का भइवा का शादी का पार्टी में, वहाँ देखा रा न बे एक ठो सोलिट चीज़, वो बेटा फिर से नज़र आया रा मेरे को २४ नंबर रोड में ..."

बाकी सदस्यों कि बेचैनी बढ़ चुकी है और वो तुरंत जानना चाहते हैं -
"कहाँ पर बे, बता न...साला बौत सोलिट गेम रा बे... "

"मालूम नई किसका घर में रहता है पर बेटा उसका साथ में साला पूरा फिल्डिंग है बे"

"अबे वो बिहारी-बंगाली का घर का पीछे में एक ठो लाल बुल्लेट वाला घर देखा है न, उधरी किधर तो जाते देखा रा वो दिन..मगर साला साथ में एक ठो ढाबुट और एक ठो बेटा छक्का जैसा लौंडा भी रा..."

जमशेदपुर में जब मैं रहता था, उस वक़्त टीवी का प्रभाव जरा जरा सा दिखने लगा था, बावजूद उसके, हर मोहल्ले के मैदान में, या फिर अड्डा पर जो अक्सर सड़क के किसी कोने पर बने कलवट पर जिसे जमशेदपुर कि भाषा में "पुलिया" कहते हैं उस पर युवा पीढ़ी आसन्न मिलते थे जिन्हें लोग "पुलिया-तोड़" कह कर पुकारते थे। ऐसी बातों का सिलसिला अनवरत ऐसे ही चलता रहता है। अगर आप जमशेदपुर में रहे होंगे तो शायद ज्यादातर बातें आपको समझ में आ गयी होगी, पर अगर आप कभी नही रहे हैं तो प्रयास करने कि आवश्यकता नही है, कारण इसमे बहुत सारे शब्दों कि आपको विशेष अर्थ पहले समझना पड़ेगा ।

Monday, November 19, 2007

जमशेदपुरिया - भाग १

जमशेदपुरिया भाषा और तौर तरीका अपने आप में एक बेमिसाल अनुभव है। पुलिंग अथवा स्त्रीलिंग का भेद - भाव हो या फिर एकवचन और बहुवचन का ख्याल, "जमशेदपुरिया वाद" ने इन सब व्याकरण के परिभाषाओं व परिपाटियों को अपने में सम्मिलित और समाहित कर एकाकार कर दिया है। "तेरा माँ आ रा है" या फिर "तेरा बाप आ रा है", इन दोनों वाक्यों में जमशेदपुरिया वाद के पुट हैं - पुलिंग और स्त्रीलिंग में कोई भेद नहीं है। बस का कन्डक्टर भी, उसी भाव में विभोर "रोकेगा एक लेडिच है" बोल बैठता था। वाक्य पर पुनः गौर करें - १ लेडीच - लेडीज़ - मतलब एक महिलाएं!

चेतावनी - जमशेदपुरिया में व्याकरण के बारीकियों में जाने का प्रयास भी न करें! यहाँ गइया - मतलब गाय, कभी चरता है या कभी "चर्र रा है" या फिर और भी संक्षिप्त में - "गैया चर्रा बे" !  किसी को पुकारने से कहता है - आर्रा बे - अर्थात, (मैं) आ रहा हूँ - एक तो, जम्सघेदपुर में - "मैं" शब्द का प्रयोग वर्जित सा है, और उसके बदले "हम" का प्रयोग होता है। वैसे ज्यादातर वाक्यों में, "हम" का भी उपयोग, नहीं के बराबर ही होता है - जैसे " कहाँ जार्रा बे?", "देख नई रा बे - खार्रा" आदि।

पढे-लिखे लोग हों या सब्जी बेचने वाला, कोई दक्षिण से आया हुआ हो या उत्तर भारत से - जमशेदपुर में, हर किसी की बोली एक जैसी और सब के सब अंततः जमशेदपुरिया में ही सम्मिलित हो जाते हैं । मेरी समझ से, जमशेदपुर भारत का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ आप भारत के हर प्रांतों से आये लोगों के साथ हिल मिल कर रहते हैं।

 "जमशेदपुरिया व्याकरण" अथवा स्थानीय भाषा के विकास में सबों का उतना ही योगदान है, जैसे इन्द्रधनुष बनने में सातों रंगों का। चाहे कोई किसी भी प्रांत से आया हो, या किसी भी मातृभाषा का हो, हर कोई, "जमशेदपुरिया भाषा" में अपनी एक पहचान को पाता है। ये एक बहुत ही अनूठा संयोग है कि हर किसी ने, अपनी भाषा का प्रयोग करते रहने के साथ-साथ, हिंदी को भी अपना लिया, और इस तरह से हिंदी भाषा के - जमशेदपुरिया-संस्करण - के माध्यम से हिंदी भाषा को, एक बेमिसाल प्रारूप दे डाला।

अनेकों प्रयोग को संचालित करके, हिंदी को जन-मानस की भाषा बनाने के लिए, सरकार ने न जाने कितने करोड़ों रुपये और बरसों से अथक परियोजनाएं बनाई, पर वे अब तक पूर्णतः सफल नहीं हो पाये हैं। पर उसी उद्देश्य को पर्याप्त करने के लिए, जमशेदपुर शहर ने, हिंदी को लचीला बना कर - एक ऐसा माध्यम बना दिया, जिसे हर किसी ने अपने रूप से परिवर्तित करके  अपना लिया। दूसरा पहलू विचार योग्य, यह है कि जमशेदपुरिया  हिंदी भाषा में, आपको कहीं न कहीं, हर भाषा या प्रांत की छाप मिल जायेगी।

जमशेदपुर एक औद्योगिक शहर है जिसकी स्थापना करीब १९०७ के आसपास हुयी थी। उन शुरुआत के दिनों से ही, इस शहर में, देश के हर प्रान्त से, लोग आते गए और बसते चले गए।  इन करीब सौ साल के दरम्यान, हरेक प्रान्त के लोग - अपने भाषा, रहने के तौर- तरीको के अमिट-छाप को छोड़ते हुए- जमशेदपुर को, एक ऐसी सभ्यता, भाषा और रहन-सहन का तौर तरीका दिया है, जो बेमिसाल सा है! यहाँ पले-बढे लोगों में, दूसरों के रहन-सहन, तौर-तरीके, खान-पान आदि का बहुत अच्छा ज्ञान और सम्मान होता है - साथ ही वे बहुत सहिष्णु से होते हैं, और या तो दूसरों के तौर तरीके की कोई परवाह नहीं करते या उनकी इज़्ज़त करते हैं। ये बहुत आम बात सी थी कि जब कभी हम, अपने किसी मित्र के घर जाते थे - उनके घर में, बिलकुल एक अलग भाषा में बात की जाती थी - जो हमारे समझ से कोसो दूर से थे - बावजूद इसके, जब कभी हमारे मित्र हमसे बातें करते- वो होता था एक शुद्ध - जमशेदपुरिया हिंदी - समझ रा न बे - चल बेटा, तेरे को आगे का बात समझा रा है!

जमशेदपुरिया भाषा का एक अनुभव, आप तब कर सकते हैं, जब रेल से सफर करते हुए टाटानगर रेलवे स्टेशन पहुंच रहे हों। जैसे जैसे ट्रेन जमशेदपुर के रेलवे स्टेशन के आस पास आने लगती है, आप अचानक से रेल के डिब्बे में जमशेदपुरिया भाषा का प्रयोग अनुभव करेंगे -
"अबे सुन्न बे, साला जुगसलाई पार हो गिया बे, अपना गोदाम नीचे ले आ बे..."
इस तरह के वाक्यों का अर्थ समझने के लिए आपको जमशेदपुरिया से अवगत होना ही पड़ेगा।

अनेक अशुद्धियों के बावजूद, जब आप एक दूसरे से मिलेंग,  तो आपकी जुबान पर बरबस ही जमशेदपुरिया आ जाएगा। मैंने कई बार अनुभव किया है कि लोगों से बोलचाल के दौरान, अगर आप बहुत शुद्ध हिंदी भाषा का प्रयोग करने का प्रयास करेंगे, तो आप स्वयं ही झेंप जायेंगे। इसके बाद आप स्वयं ही - वापस वैसी ही भाषा का प्रयोग करेंगे - जैसी आपसे - आपके सामने खड़ा व्यक्ति अपेक्षा कर रहा है - मतलब विशुद्ध - जमशेदपुरिया!

बचपन में, मैं घर में बोले जाने वाले हिंदी और पुस्तकों में प्रयोग होने वाले हिंदी के विरोधाभास से, विचिलित तो था ही, परन्तु बहुत दिनों तक. मैं घर के बाहर बोलचाल की भाषा के अशुद्धता एवं अजीबोगरीब शब्दों के प्रयोग को, कतिपय लोगों के हिंदी मातृभाषा न होने की वजह समझता रहा।

शुरुआत के दिनों में, मैंने ये मान लिया था कि शायद मेरे इर्द-गिर्द रहने वाले लोग, दक्षिण एवं बंगाल के साथ साथ स्थानीय आदिवासी प्रभुल के थे, अतः उन लोगों ने अपनी बोली वैसी बना ली होगी और हिंदी का एक नया रुप को अपना लिया था। परन्तु, धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि मैं बहुत अनजान था, कारण मेरे अंतर्मन में जमशेदपुरिया भाषा ने अपना जगह बना लिया था, परन्तु मैं उससे अनभिज्ञ उसे अब तक एक परिपक्व भाषा शैली के रूप में उसी तरह से स्वीकार नही किया था - जैसे विश्व ने अब तक भारत को संयुक्त राष्ट्र का स्थाई सदस्य नहीं माना है। हालांकि, कुछेक शब्दों के अर्थ समझने के लिए तो मुझे करीब १८-२० सालों की प्रतीक्षा करनी पडी- क्योंकि ज्यादातर इस तरह के शब्दों का उद्गम स्त्रोत हिंदी नहीं होता था। मसलन, क्रिकेट खेलते समय, अक्सर हम एक शब्द का प्रयोग किया करते थे - "हॉस्पिटल २ रन" ।

इसे समझाने के पहले, जैसे परिवेश में हम क्रिकेट खेलते थे मुझे पहले उसका विवरण देना पड़ेगा। हम अक्सर, घर के बाहर बने बागान या गली में खेलते थे। ऐसे जगहों पर लोगों के स्कूटर या "खटिया" इत्यादि जैसे अनेकानेक वस्तुएं रखे होते थे। फलस्वरूप, इन वस्तुओं से गेंद के टकरा जाने के बाद, गेंद किसी भी कोने या ऐसे जगह जा सकती थी जहाँ से गेंद को निकाल कर लाना, आसान नही होता था - कम से कम क्षेत्ररक्षण से - कोसों दूर का मामला सा होता था!  इसके आलावा, अक्सर गेंद, इन सामग्रियों में, विलुप्त भी हो जाती थी।

ऐसी परिस्थिति में, गेंद को खोजने में समय व्यतीत करने के प्रयास में, दो बातें होने की पूरी गुंजाईश थी - एक तो यह, कि आपाधापी में, समान के तितर-बितर होने के साथ-साथ सूख रहे आचार के "बोइयाम"- बरनी आदि जैसे कांच के सामग्रियों के टूटने की पूरी गुंजाईश होती थी! और, दूसरा यह कि हमें क्रिकेट के नियम कानून का, इतना ज्ञान अवश्य हो गया था कि जब तक गेंद बाउंड्री लाइन के बाहर नही जाती हो, और ऎसे स्थिति में जब तक फील्डर के द्वारा, गेंद वापस गेंदबाज के हाथ में नही आ जाती, गेंद "डेड" नहीं मानी जाती है। इस प्रकार से, क्रिकेट के अजीबोगरीब नियम के तहत, ऐसे मौक़े पर बल्लेबाज दौड़-दौड़ कर पचासों रन बना सकता है। शायद एकाध बार खेलते समय, हमें ऐसा कटु अनुभव हो चुका था अथवा हमारे पहले के पीढ़ी के अनुभव के इनसाइक्लोपीडिया के संग्रह से - प्राप्त ज्ञान सा था, जिसका तकाजा था कि हमारे क्रिकेट के नियम कानून में, इस नए नियम -"हॉस्पिटल २ रन"- का इजाफा कर दिया गया था। इस कानून का मतलब यह होता था कि अगर गेंद वैसे किसी जगह पर चल जाये, तो ज्यादा परिश्रम कि आवश्यकता नहीं है - और एक पूर्व-निर्धारित रन दे दिया जाएगा।

क्रिकेट के नियमों के इस संशोधन का, हमारे मोहल्ले के क्रिकेट पर, बहुत दूरगामी प्रभाव पड़ा। अब न ही बल्लेबाज को बार-बार दौड़ कर, रन लेने जैसा उबाऊ काम करना पड़ता था, और न ही फील्डिंग टीम को, ज्यादा परेशान होने की आवश्यकता होती थी। जैसा खेल के प्रारंभ में ही निर्णय ले लिया जाता था, ऐसे शॉट खेलने के लिए एक पूर्व-निर्धारित रन - आमतौर पर २ या ३ रन- दे दिया जाता था।

नियम की तो बात ठीक थी, परन्तु इस शब्द का अर्थ, मुझे बहुत बाद में समझ में आयी। ये गुत्थी तब सुलझी, जब मैं एक बार अंग्रेज़ी के "ओब्स्टकल" शब्द से, अपने बचपन के तार को जोड़ा। हॉस्पिटल  शब्द, वैसे काफी करीब सा था- obstacle - शब्द के! मगर किसे क्या फर्क पड़ता था, एक दूसरे को अपने क्रिकेट के नियमों को समझाने के लिए, कोई सा भी शब्द माध्यम बन सकता था - हॉस्पिटल हो या ऑब्सटिकल - क्या फर्क पड़ता था?

अब तक तो आपको काफी अंदाज़ लग गया होगा कि जमशेदपुरिया एक भाषा मात्र ही नही है। ये अपने आप में एक स्थान-विशेष की विविधताएँ को साथ-साथ लिए, बहुत सारे विशेष प्रकार के अनुभवों को भी सिमटे हुए, जमशेदपुर की एक पहचान सी बन गया है।

जमशेदपुरिया - एक ऐसा सागर है, जहाँ  छोटी-बड़ी, बरसाती-सदाबहार और अन्य अनेकानेक प्रकार की नदियों का संगम होता है। देश के लगभग हर प्रान्त के खान-पान और रहन-सहन को मिला कर, जमशेदपुरिया  बना है - जिसका एक अलग सा, अपना ही पहचान है, और अनेको रंग के मिल जाने पर, इसका एक नया - अनूठा सा रंग बन गया है।

बिहारीलाल के दोहे में, जिस तरह से - "गागर में सागर" की संज्ञा दी जाती है , जमशेदपुर का रहन-सहन लगभग उसी का प्रतिरूप है। मैं अगले ब्लॉग में, अपने बचपन से बड़े होने के क्रम में संकलित ,जमशेदपुर के कुछ अनुभवों के साथ-साथ जमशेदपुरिया में प्रयोग होने वाले, कुछ अनूठे शब्दों का संकलन भी पेश करूँगा ।
(क्रमशः)