Tuesday, December 11, 2007

जमशेदपुरिया : भाग ५

अपने पिछले ब्लाग में, मैंने अपने बचपन की चर्चा की थी। हमारे बचपन में, ज्यादा कुछ करने को नही होता था। फलस्वरूप, हम स्वयं बहुत तरह के -"समयाकाटू" तरीकों का - अनुसंधान करते रहते थे।

इस क्रम में खास कर, सर्दी और गर्मियों की छुट्टियाँ बहुत उपयुक्त होते थे। गर्मियों कि छुट्टियों में, ज्यादातर बिहारी परिवार का, गाँव जाने का प्रचलन काफी आम था। और, ये आम-बात, वास्तव में "आम" के लिए ही होता था। ऐसा कोई अचानक से, "ग्राम-प्रेम" छलकने जैसे कारणों से नही होता था, बल्कि शहर में ठूंस-ठूंस कर खाने के बाद भी, अपने गाँव में रहने वाले बाक़ी परिवार के सदस्यों को अपने पुश्तैनी आम के बागीचे का उपभोग करते देखना, लोगो को गंवारा नहीं होता था। फलतः, सपरिवार गाँव के आम का बँटवारा और अपने हिस्से से बटोर कर लाने जाते थे।

हालांकि, गाँव जाने की प्रथा, दक्षिण भारतीयों में भी होता था। मगर बिहारी अपने गाँव जाने के बारे में कहता था कि "हम अपना गाँव जा रा एक महीना के लिए"
दक्षिण भारतीय कहते थे कि " हमलोकोन अपना "देस" जा रा"
बंगाली कहते थे " हमलोकोन अपना बाड़ी जा रहा है"।

जैसा  मैंने पूर्व के ब्लॉग में, पहले भी बताया है कि जमशेदपुर में, एक ही बात को कहने के बहुत सारे अलग अलग-अंदाज़, होते थे। और, मजे की बात ये है कि कुछेक शब्दों के प्रयोग करने वाले के मातृभाषा का, हमें ज्ञान हो जाता था। गाँव, देस, बाड़ी या किसी भी और शब्दों का प्रयोग हो, अंततः, समझने वाले को कोई खास परेशानी नहीं होती थी।

 जब मैं पहली बार कनाडा और अमेरिका में आया, तो हमें, कभी भी प्रवासियों के बीच रहने में कोई खास दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा। इसका कारण यह था कि जमशेदपुर में, वैसे ही अनेकों प्रान्त से आये लोगों के पले-बढे होने के कारण - विदेश में भी भारत के अनेकों प्रान्त से बसे प्रवासियों के बीच रहने जैसे माहौल की, पहले से ही आदत थी।

हालांकि, हमें बचपन में, अलग अलग प्रान्त से आये जमशेदपुर के मित्रों की कहानियाँ मिलती जुलती लगती थी और हर कोई का एक सूत्र टाटा से जुड़ा सा होता था- परन्तु इतने सालों के बाद भी, हर किसिस की अपनी विविधतायें और विशेष प्रकार के रीते रिवाज या भाषा का प्रभाव दिख ही जाता था।

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