जमशेदपुरिया भाषा और तौर तरीका अपने आप में एक बेमिसाल अनुभव है। पुलिंग अथवा स्त्रीलिंग का भेद - भाव हो या फिर एकवचन और बहुवचन का ख्याल, "जमशेदपुरिया वाद" ने इन सब व्याकरण के परिभाषाओं व परिपाटियों को अपने में सम्मिलित और समाहित कर एकाकार कर दिया है। "
तेरा माँ आ रा है" या फिर "
तेरा बाप आ रा है", इन दोनों वाक्यों में जमशेदपुरिया वाद के पुट हैं - पुलिंग और स्त्रीलिंग में कोई भेद नहीं है। बस का कन्डक्टर भी, उसी भाव में विभोर "
रोकेगा एक लेडिच है" बोल बैठता था। वाक्य पर पुनः गौर करें - १
लेडीच - लेडीज़ - मतलब
एक महिलाएं!
चेतावनी - जमशेदपुरिया में व्याकरण के बारीकियों में जाने का प्रयास भी न करें! यहाँ
गइया - मतलब गाय, कभी
चरता है या कभी "चर्र रा है" या फिर और भी संक्षिप्त में - "
गैया चर्रा बे" ! किसी को पुकारने से कहता है -
आर्रा बे - अर्थात, (मैं)
आ रहा हूँ - एक तो, जम्सघेदपुर में - "मैं" शब्द का प्रयोग वर्जित सा है, और उसके बदले "हम" का प्रयोग होता है। वैसे ज्यादातर वाक्यों में, "हम" का भी उपयोग, नहीं के बराबर ही होता है - जैसे " कहाँ जार्रा बे?", "देख नई रा बे - खार्रा" आदि।
पढे-लिखे लोग हों या सब्जी बेचने वाला, कोई दक्षिण से आया हुआ हो या उत्तर भारत से - जमशेदपुर में, हर किसी की बोली एक जैसी और सब के सब अंततः जमशेदपुरिया में ही सम्मिलित हो जाते हैं । मेरी समझ से, जमशेदपुर भारत का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ आप भारत के हर प्रांतों से आये लोगों के साथ हिल मिल कर रहते हैं।
"जमशेदपुरिया व्याकरण" अथवा स्थानीय भाषा के विकास में सबों का उतना ही योगदान है, जैसे इन्द्रधनुष बनने में सातों रंगों का। चाहे कोई किसी भी प्रांत से आया हो, या किसी भी मातृभाषा का हो, हर कोई, "जमशेदपुरिया भाषा" में अपनी एक पहचान को पाता है। ये एक बहुत ही अनूठा संयोग है कि हर किसी ने, अपनी भाषा का प्रयोग करते रहने के साथ-साथ, हिंदी को भी अपना लिया, और इस तरह से हिंदी भाषा के -
जमशेदपुरिया-संस्करण - के माध्यम से हिंदी भाषा को, एक बेमिसाल प्रारूप दे डाला।
अनेकों प्रयोग को संचालित करके, हिंदी को जन-मानस की भाषा बनाने के लिए, सरकार ने न जाने कितने करोड़ों रुपये और बरसों से अथक परियोजनाएं बनाई, पर वे अब तक पूर्णतः सफल नहीं हो पाये हैं। पर उसी उद्देश्य को पर्याप्त करने के लिए, जमशेदपुर शहर ने, हिंदी को लचीला बना कर - एक ऐसा माध्यम बना दिया, जिसे हर किसी ने अपने रूप से परिवर्तित करके अपना लिया। दूसरा पहलू विचार योग्य, यह है कि
जमशेदपुरिया हिंदी भाषा में, आपको कहीं न कहीं, हर भाषा या प्रांत की छाप मिल जायेगी।
जमशेदपुर एक औद्योगिक शहर है जिसकी स्थापना करीब १९०७ के आसपास हुयी थी। उन शुरुआत के दिनों से ही, इस शहर में, देश के हर प्रान्त से, लोग आते गए और बसते चले गए। इन करीब सौ साल के दरम्यान, हरेक प्रान्त के लोग - अपने भाषा, रहने के तौर- तरीको के अमिट-छाप को छोड़ते हुए- जमशेदपुर को, एक ऐसी सभ्यता, भाषा और रहन-सहन का तौर तरीका दिया है, जो बेमिसाल सा है! यहाँ पले-बढे लोगों में, दूसरों के रहन-सहन, तौर-तरीके, खान-पान आदि का बहुत अच्छा ज्ञान और सम्मान होता है - साथ ही वे बहुत सहिष्णु से होते हैं, और या तो दूसरों के तौर तरीके की कोई परवाह नहीं करते या उनकी इज़्ज़त करते हैं। ये बहुत आम बात सी थी कि जब कभी हम, अपने किसी मित्र के घर जाते थे - उनके घर में, बिलकुल एक अलग भाषा में बात की जाती थी - जो हमारे समझ से कोसो दूर से थे - बावजूद इसके, जब कभी हमारे मित्र हमसे बातें करते- वो होता था एक शुद्ध - जमशेदपुरिया हिंदी -
समझ रा न बे - चल बेटा, तेरे को आगे का बात समझा रा है!
जमशेदपुरिया भाषा का एक अनुभव, आप तब कर सकते हैं, जब रेल से सफर करते हुए टाटानगर रेलवे स्टेशन पहुंच रहे हों। जैसे जैसे ट्रेन जमशेदपुर के रेलवे स्टेशन के आस पास आने लगती है, आप अचानक से रेल के डिब्बे में जमशेदपुरिया भाषा का प्रयोग अनुभव करेंगे -
"अबे सुन्न बे, साला जुगसलाई पार हो गिया बे, अपना गोदाम नीचे ले आ बे..."
इस तरह के वाक्यों का अर्थ समझने के लिए आपको जमशेदपुरिया से अवगत होना ही पड़ेगा।
अनेक अशुद्धियों के बावजूद, जब आप एक दूसरे से मिलेंग, तो आपकी जुबान पर बरबस ही जमशेदपुरिया आ जाएगा। मैंने कई बार अनुभव किया है कि लोगों से बोलचाल के दौरान, अगर आप बहुत शुद्ध हिंदी भाषा का प्रयोग करने का प्रयास करेंगे, तो आप स्वयं ही झेंप जायेंगे। इसके बाद आप स्वयं ही - वापस वैसी ही भाषा का प्रयोग करेंगे - जैसी आपसे - आपके सामने खड़ा व्यक्ति अपेक्षा कर रहा है - मतलब विशुद्ध -
जमशेदपुरिया!
बचपन में, मैं घर में बोले जाने वाले हिंदी और पुस्तकों में प्रयोग होने वाले हिंदी के विरोधाभास से, विचिलित तो था ही, परन्तु बहुत दिनों तक. मैं घर के बाहर बोलचाल की भाषा के अशुद्धता एवं अजीबोगरीब शब्दों के प्रयोग को, कतिपय लोगों के हिंदी मातृभाषा न होने की वजह समझता रहा।
शुरुआत के दिनों में, मैंने ये मान लिया था कि शायद मेरे इर्द-गिर्द रहने वाले लोग, दक्षिण एवं बंगाल के साथ साथ स्थानीय आदिवासी प्रभुल के थे, अतः उन लोगों ने अपनी बोली वैसी बना ली होगी और हिंदी का एक नया रुप को अपना लिया था। परन्तु, धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि मैं बहुत अनजान था, कारण मेरे अंतर्मन में जमशेदपुरिया भाषा ने अपना जगह बना लिया था, परन्तु मैं उससे अनभिज्ञ उसे अब तक एक परिपक्व भाषा शैली के रूप में उसी तरह से स्वीकार नही किया था - जैसे विश्व ने अब तक भारत को संयुक्त राष्ट्र का स्थाई सदस्य नहीं माना है। हालांकि, कुछेक शब्दों के अर्थ समझने के लिए तो मुझे करीब १८-२० सालों की प्रतीक्षा करनी पडी- क्योंकि ज्यादातर इस तरह के शब्दों का उद्गम स्त्रोत हिंदी नहीं होता था। मसलन, क्रिकेट खेलते समय, अक्सर हम एक शब्द का प्रयोग किया करते थे - "
हॉस्पिटल २ रन" ।
इसे समझाने के पहले, जैसे परिवेश में हम क्रिकेट खेलते थे मुझे पहले उसका विवरण देना पड़ेगा। हम अक्सर, घर के बाहर बने बागान या गली में खेलते थे। ऐसे जगहों पर लोगों के स्कूटर या "खटिया" इत्यादि जैसे अनेकानेक वस्तुएं रखे होते थे। फलस्वरूप, इन वस्तुओं से गेंद के टकरा जाने के बाद, गेंद किसी भी कोने या ऐसे जगह जा सकती थी जहाँ से गेंद को निकाल कर लाना, आसान नही होता था - कम से कम क्षेत्ररक्षण से - कोसों दूर का मामला सा होता था! इसके आलावा, अक्सर गेंद, इन सामग्रियों में, विलुप्त भी हो जाती थी।
ऐसी परिस्थिति में, गेंद को खोजने में समय व्यतीत करने के प्रयास में, दो बातें होने की पूरी गुंजाईश थी - एक तो यह, कि आपाधापी में, समान के तितर-बितर होने के साथ-साथ सूख रहे आचार के "बोइयाम"- बरनी आदि जैसे कांच के सामग्रियों के टूटने की पूरी गुंजाईश होती थी! और, दूसरा यह कि हमें क्रिकेट के नियम कानून का, इतना ज्ञान अवश्य हो गया था कि जब तक गेंद बाउंड्री लाइन के बाहर नही जाती हो, और ऎसे स्थिति में जब तक फील्डर के द्वारा, गेंद वापस गेंदबाज के हाथ में नही आ जाती, गेंद "डेड" नहीं मानी जाती है। इस प्रकार से, क्रिकेट के अजीबोगरीब नियम के तहत, ऐसे मौक़े पर बल्लेबाज दौड़-दौड़ कर पचासों रन बना सकता है। शायद एकाध बार खेलते समय, हमें ऐसा कटु अनुभव हो चुका था अथवा हमारे पहले के पीढ़ी के अनुभव के इनसाइक्लोपीडिया के संग्रह से - प्राप्त ज्ञान सा था, जिसका तकाजा था कि हमारे क्रिकेट के नियम कानून में, इस नए नियम -"हॉस्पिटल २ रन"- का इजाफा कर दिया गया था। इस कानून का मतलब यह होता था कि अगर गेंद वैसे किसी जगह पर चल जाये, तो ज्यादा परिश्रम कि आवश्यकता नहीं है - और एक पूर्व-निर्धारित रन दे दिया जाएगा।
क्रिकेट के नियमों के इस संशोधन का, हमारे मोहल्ले के क्रिकेट पर, बहुत दूरगामी प्रभाव पड़ा। अब न ही बल्लेबाज को बार-बार दौड़ कर, रन लेने जैसा उबाऊ काम करना पड़ता था, और न ही फील्डिंग टीम को, ज्यादा परेशान होने की आवश्यकता होती थी। जैसा खेल के प्रारंभ में ही निर्णय ले लिया जाता था, ऐसे शॉट खेलने के लिए एक पूर्व-निर्धारित रन - आमतौर पर २ या ३ रन- दे दिया जाता था।
नियम की तो बात ठीक थी, परन्तु इस शब्द का अर्थ, मुझे बहुत बाद में समझ में आयी। ये गुत्थी तब सुलझी, जब मैं एक बार अंग्रेज़ी के "ओब्स्टकल" शब्द से, अपने बचपन के तार को जोड़ा। हॉस्पिटल शब्द, वैसे काफी करीब सा था- obstacle - शब्द के! मगर किसे क्या फर्क पड़ता था, एक दूसरे को अपने क्रिकेट के नियमों को समझाने के लिए, कोई सा भी शब्द माध्यम बन सकता था - हॉस्पिटल हो या ऑब्सटिकल - क्या फर्क पड़ता था?