Thursday, March 20, 2008

जमशेदपुरिया : भाग ७

जमशेदपुर के लोग और उनके द्वारा बोले जाने वाले विशेष उच्चारण और शब्दों का अनूठा संगम!
गौर फरमायें इन सारे वाक्यों पर, अब का तो नहीं पता, पर १९७० और ८० के दशक तक तो लोग ऐसे ही बोलते थे, संभव है कि अंग्रेज़ी माध्यम की पढ़ाई और टीवी के व्यापक प्रसार से अब इस तरह के भाषा का प्रयोग सीमित हो गया हो, पर हमारे समय में तो लोग इसी तरह से बोलते थे -
भक बे,
धत्त तेरे की,
ऐ ल्ले,
का कर रा बे,
भक साला चुप्प,
तभी से तेरे को देख रा,
तेरे को बहुत देर से बर्दाश्त कर रा,
का बे, बड़ी मस्ती हो रा का तेरे को?
 घबराइये नही, मैं आपको ऐसा कुछ भी नही कह रहा हूँ ! बल्कि हो सकता है कि अगर आप जमशेद्पुरिया हैं, तो शायद मुझे अबतक अपने मन में ही सही, अब तक कुछ ऐसा कह बैठे होंगे!


आज मैं जमशेदपुर के लोगों के बीच होने वाली कुछ ऐसे वाक्यों का उल्लेख कर रहा हूँ जो उनके द्वारा ऐसे वक्त प्रयोग होते हैं जब वो बिल्कुल व्यथित हो जाते हैं।

 मसलन, आप कतार में बहुत देर से खड़े हैं और अचानक टिकट खत्म हो गया तो अनायास ऐसे कुछ वाक्य स्वतः आपके मुख विन्दु से निकल पड़ेगा।

वैसे उधोलिखित वाक्यों का प्रयोग बहुत ही संयमित लोगों के द्वारा ऐसे अवसरों पर किए जाने की संभावना है, अन्यथा आप के कर्ण द्धार में, कुछ ऐसे शब्दों का प्रवेश हो जाना लाजमी है, जिसका प्रयोग शायद आप करते हो या न हों, पर  जमशेदपुर में कुछ दिनों के बाद, आप उन शब्दों से जरूर परिचित हो जायेंगे- मेरा तात्पर्य, जमशेदपुर के बहुत सारे "उपयोगी" अथवा उपयोग में आने वाले - गालियों - से है।

Thursday, December 13, 2007

जमशेदपुरिया : भाग ६

आज मैं जमशेदपुर मैं प्रयोग होने वाले कुछ विशिष्ट प्रकार के शब्दों का व्याख्यान करूँगा। ऐसा, मैं अनेक कारणों से, करना चाहता था। सबसे पहला कारण तो यह है कि मैं बचपन से इन शब्दों को सुनता आया हूँ, परन्तु आज तक, इन्हें कभी कहीं छपा या लिखा हुआ, नहीं देखा हूँ। और, अभी जब इसे मैं यहाँ टाइप करूँगा, तो मुझे उतनी ही सुखद अनुभूति होगी, जितना इसे देखने वाले मेरे साथियों को! इसलिए, और ज्यादा समय नहीं लेते हुए, मैं शुरू करना चाहता हूँ।

एक और कारण, यह है कि अगर किसी को जमशेदपुर जाना हो, तो इन शब्दों को जान कर उसका फायदा उठाएं क्योंकि वहाँ के बोलचाल में, इन शब्दों का खूब प्रयोग होता है - ऐसा मेरी अवधारणा है, अब की वस्तुस्थिति का मुझे ज्ञान नहीं है- पर आज से २० साल पहले तक, इसी तरह के शब्दों का प्रयोग करते हुए, लोग बातें किया करते थे:

चाट: सबसे पहले शुरुआत किया जाये शब्द "चाट" से!  जैसा कि शब्द "चाट" का शाब्दिक अर्थ से परिलक्षित होता है कि जैसे किसी खाने कि वस्तु को चाट कर खाना चाहिऐ। बचपन में "चाट" शब्द के वास्तविक अर्थ को समझने के पूर्व,  मैं चाट शब्द के दूसरे अर्थ को पहले समझ गया था। इसलिए, जब भी मैं किसी मेले या बाज़ार में, खोमचेवाले के ठेले के ऊपर - "मथुरा चाट" या "पप्पू चाट" जैसे नाम लिखा देखता था, मुझे मन ही मन बहुत हंसी आती थी। कारण, मुझे लगता था कि क्या पूरा मथुरा "चाट" होता है या फिर अगर पप्पू "चाट" है तो इस बात का इतना प्रचार करने की क्या जरुरत है? अब तक, शायद आपको थोड़ा-थोड़ा सा समझ में आने लगा होगा कि "चाट" का अर्थ क्या होता होगा? अतः और ज्यादा नहीं "चाटते" हुए मैं इसका दूसरा अर्थ बताता हूँ।
जब कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा सिरदर्द होता है, तो हम - जमशेदपुरिया में - उसे कहते हैं:
"उसने हमारे सिर को चाट लिया", और यहीं से "चाट" शब्द को जमशेदपुर के भाषा में वैसे हर लोगों के लिए सुरक्षित कर दिया गया जो सचमुच "चाट" यानि "सिरदर्द" होते हैं। 

खखोर: मगर, कोई "कड़ा मनुष्य", "चाट" से भी ऊपर के डिग्री का हो तो उसे हम "खखोर" कहते थे। जमशेदपुर में किसी चीज़ को खुरचने को "खखोरना" कहते हैं। वास्तविक है कि अगर कोई सिर चाटने से अगले डिग्री का काम यानि खुरचने का काम करे तो उसे "खखोर" कहना गलत नहीं होगा।

घनघोर: इसके अगले डिग्री के चाट को हम "घनघोर" कहते थे। "चाट", "खखोर" और फिर "घनघोर"।

झेलू: वैसे इसी से मिलता जुलता शब्द जो प्रयोग में आता है वह है "झेलू"। यानि किसी से अगर "चटना" हो, तो वह अपने आप में एक यातना होती है। जिसे "झेलना" पड़ता है वह "झेला" रहा है - और उसके कारक को "झेलू" कहना काफी तर्कसंगत है। वैसे "झेलू" से "झेल" और फिर "झेलंटिस" बन जाना जमशेदपुर की अपनी पहचान है।
"साला बंटी बहुत बड़ा झेलंटिस है, चाट चाट के साला बर्बाद कर दिया है"।
वैसे ऊपर के इस वाक्य में "बर्बाद" शब्द का प्रयोग, जमशेदपुरिया कि छटा बिखेर रही है।

नोट: हमारे ज़माने में, जमशेदपुर के हर पुलिया, अड्डे, या गप्प-गोष्ठी में, एक न एक "चाट", "झेलंटिस", "खखोर" या/और "घनघोर" अवश्य हुआ करता था।

भंजेड़ू : वैसे अगर ऐसे लोग हों तो "भंजेड़ू" जैसे व्यक्ति का अड्डे में होना भी लाज़मी होता था। इस वाक्य पर गौर कीजिए- जमशेदपुरिया - की छठा को बिखेरता वाक्य है:
"साला दीपक भांज भांज के खटिया खड़ा कर दिया रा, बहुत बड़ा भंजेड़ू है बेटा"।
खटिया खडा होना , मेरे ख्याल से, जमशेदपुरकी अपनी उपज है। मेरे समझ में, आज तक नहीं आया कि इसकी उत्पत्ति का क्या स्तोत्र हो सकता है।

घेरा : "भांजने" का पर्यायवाची शब्द है "घेरा देना"। वैसे घेरा शब्द को मैं लक्ष्मण या "लक्खन" के साथ बहुत रोचक ढंग से प्रयोग होते सुना है।

"अबे मेरा गाँव में हमलोक का एक बहुत बड़ा महल है, मेरा दादाजी तो वहाँ का राजा रा न.."
"बेटा, ये तो पूरा "लक्खन घेरा" है..."

वैसे, जहाँ लक्ष्मण हों, वहाँ राम का होना भी आवश्यक है। अतः, जब बात कुछ ज्यादा ही आगे कि हो जाये, तो वैसे अवसर के लिए "राम घेरा" को प्रयोग  सुरक्षित रखा जाता था।

ऐसे ही विचार को व्यक्त करने के लिए "हवा देना", "गैस देना", "छोड़ना" या सिर्फ "देना" भी काफी उपयुक्त हैं।
"अबे ज्यादा हवा मत दे, हम सब समझ रा"।
"का बे हमलोक को धूर  समझ के रक्खा है क्या? तभी सेदिए  जा रा"
"ज्यादा गैस मत दे, बहुत बर्दाश्त कर लिया तेरे को"
"बेटा, आज मोहन अपना चाचा के बारे में बहुत छोड़ रा था..."

ऊपर लिखे वाक्य, वैसे लोगों के लिए है, जो कुछ ज्यादा बोल जाते हैं। कुछ लोगों की, वैसे आदत सी होती है, किसी भी बात को कुछ ज्यादा बढ़ा चढा के कहने की।

Tuesday, December 11, 2007

जमशेदपुरिया : भाग ५

अपने पिछले ब्लाग में, मैंने अपने बचपन की चर्चा की थी। हमारे बचपन में, ज्यादा कुछ करने को नही होता था। फलस्वरूप, हम स्वयं बहुत तरह के -"समयाकाटू" तरीकों का - अनुसंधान करते रहते थे।

इस क्रम में खास कर, सर्दी और गर्मियों की छुट्टियाँ बहुत उपयुक्त होते थे। गर्मियों कि छुट्टियों में, ज्यादातर बिहारी परिवार का, गाँव जाने का प्रचलन काफी आम था। और, ये आम-बात, वास्तव में "आम" के लिए ही होता था। ऐसा कोई अचानक से, "ग्राम-प्रेम" छलकने जैसे कारणों से नही होता था, बल्कि शहर में ठूंस-ठूंस कर खाने के बाद भी, अपने गाँव में रहने वाले बाक़ी परिवार के सदस्यों को अपने पुश्तैनी आम के बागीचे का उपभोग करते देखना, लोगो को गंवारा नहीं होता था। फलतः, सपरिवार गाँव के आम का बँटवारा और अपने हिस्से से बटोर कर लाने जाते थे।

हालांकि, गाँव जाने की प्रथा, दक्षिण भारतीयों में भी होता था। मगर बिहारी अपने गाँव जाने के बारे में कहता था कि "हम अपना गाँव जा रा एक महीना के लिए"
दक्षिण भारतीय कहते थे कि " हमलोकोन अपना "देस" जा रा"
बंगाली कहते थे " हमलोकोन अपना बाड़ी जा रहा है"।

जैसा  मैंने पूर्व के ब्लॉग में, पहले भी बताया है कि जमशेदपुर में, एक ही बात को कहने के बहुत सारे अलग अलग-अंदाज़, होते थे। और, मजे की बात ये है कि कुछेक शब्दों के प्रयोग करने वाले के मातृभाषा का, हमें ज्ञान हो जाता था। गाँव, देस, बाड़ी या किसी भी और शब्दों का प्रयोग हो, अंततः, समझने वाले को कोई खास परेशानी नहीं होती थी।

 जब मैं पहली बार कनाडा और अमेरिका में आया, तो हमें, कभी भी प्रवासियों के बीच रहने में कोई खास दिक्कत का सामना नहीं करना पड़ा। इसका कारण यह था कि जमशेदपुर में, वैसे ही अनेकों प्रान्त से आये लोगों के पले-बढे होने के कारण - विदेश में भी भारत के अनेकों प्रान्त से बसे प्रवासियों के बीच रहने जैसे माहौल की, पहले से ही आदत थी।

हालांकि, हमें बचपन में, अलग अलग प्रान्त से आये जमशेदपुर के मित्रों की कहानियाँ मिलती जुलती लगती थी और हर कोई का एक सूत्र टाटा से जुड़ा सा होता था- परन्तु इतने सालों के बाद भी, हर किसिस की अपनी विविधतायें और विशेष प्रकार के रीते रिवाज या भाषा का प्रभाव दिख ही जाता था।

Monday, December 10, 2007

जमशेदपुरिया : भाग ४

जमशेदपुर के गर्मी के एक दोपहर की झलक - गर्मी-छुट्टी का समय, स्कूल बंद, जून के गर्मी के दिन की  तपती दोपहरिया का समय, लू के थपेड़ो से बचने के लिए लोग मुंह में गमछे को बाँध कर - जो जरा पैसे वाले हैं- काले चश्मा को लगाये, साइकल या किसी प्रकार के दोपहिये- स्कूटर या मोटरसाइकल को चलाते,  कुछ ६ बजे वाली शिफ्ट का काम ख़त्म करके प्लांट से आते और कुछ २ बजे शिफ्ट के काम पर जाते हुए, सड़क के पिघले अलकतरे पर- टायर के - फट-फट करती आवाज, सामने के पेड़ के धूप-छाँव से छन-छन कर, रूक-रुक कर गर्मी से राहत मांगती हुयी - कोयल की रुंधती हुयी आवाज, दूर गली में ऊंची आवाज़ में सामान के बारे में चिल्ला कर फेरी लगाता हुआ - गर्मी के विरल वातावरण में - आवाज दूर -दूर तक गूंजती सी, थके-हारे कुत्ते कहीं किसी पेड़ के छाये में पनाह लेते हुए से - और, घर में कोई काम न होने के कारण- किसी मोहल्ले के आस-पास के दोस्त के पास पहुँच कर, होते हुए कुछ ऐसे संवादों का सिलसिला-
" अबे गिरी फिरिज़ का ठंडा पानी पिला न बे..."
" बेटा फिरिज का सब पानी खतम हो गिया है, सरकारी माल समझ के रक्खा है, क्या बे? "
" अबे दे न यार, अच्छा चल एक ठो बोतल ले आ न , उसी में काम हो जाएगा बे.."
"बेटा, अभी तेरे को देगा, तो उधर से बडकू, कृष्णा और पूरा गेंग आ जाएगा, समझा न ?"
"अरी बेटा, आज बहुत्त भाव खा रा बे, नई देखेगा बड़कू लोकोन , अबे ला न, साइड में खड़ा हो के हमलोक पी लेगा...बेटा, आज तुम बड़ी पैंतरा ले रा बे, मालूम, मेरे पास वेताल का नया वाला कॉमिक्स आ गिया है, समझा न.."
" सही में बे? रूक, रुक.... अभी..ले के आ रा बे... हम अभी पानी ले के आ रा है बे..... "
मेरा बचपन - कुछ इसी तरह का होता था और इस तरह के वार्तालाप, मेरे बचपन के किसी पुराने कैसेट का पुनर्प्रसारण जैसा कार्यक्रम है।

अगर आपने इस वार्तालाप को समझने कि कोशिश की होगी, तो भाषा के अलावा, शायद कुछ तथ्य आपके नहीं पल्ले पड़ा होगा। अतः, मुझे कुछेक बातों का यहाँ उल्लेख करना पड़ेगा।

हमारे बचपन में सबों के घर में फ्रीज़ नही होता था। और, जिनके घर में होता था, गर्मी के छुट्टियों में, हम लोगों का उनके घर में चींटियों की तरह, ताँता लगा रहता था। पानी के बोतल को भरते रहने के साथ-साथ, हम फ्रीज़ की क्षमता का भी हम ख्याल नहीं करते थे। जिस दोस्त के घर ऐसा कोई उपकरण होता था, लाजमी है - उसका "पैंतरा" हमें झेलना पड़ता था बचपन से ही हमारा "nigotiation स्किल" और "persuasion स्किल" जैसे कठिन गुणों का प्रादुर्भाव होने लगा था।

टीवी या किसी और अन्य मनोरंजन के अभाव में, इन्द्रजाल कॉमिक्स, हमारा आज के युग के विडियो गेम्स या कार्टून चैनल्स का प्रतिद्वंदी होता था। वेताल, मैँडिॅक, बहादुर, फ्लैश गार्डन आदि जैसे लीड characters हमारे पसंदीदा नायक होते थे। वेताल के सारे परिवार के विषय पर, हम घंटों तक गोष्ठी चला सकते थे। चाहे वो गार्थ नामक अजीबोगरीब चरित्र हो - जो हमेशा "गुच्छियाँ" खाता रहता था, या फिर वेताल का घोड़ा - तूफ़ान हो, वेताल का खोपड़ीनुमा गुफा हो - या फिर उसकी प्रेयसी डायना और दत्तक पुत्र रेक्स हो - हम बडे चाव से उनको पढ़ते हुए - उस कॉमिक्स के पूरे ताने-बुने में उलझे से रहते थे।

टीवी न होने के साथ-साथ, उस जमाने में न कोई FM रेडियो होता था, और न ही कोई स्थानीय रेडियो स्टेशन होता था - जहाँ से, हम मनोरंजन के लिए किसी तरह का गाना सुन सकते थे। ऐसे अभाव के दिनों में, कुछ लोगों के घर पर रेकॉर्ड-प्लेयर हुआ करता था। हम बडे जतन से, चोरी -छिपे, वैसे किसी के घर पर - जब उनके घर कोई अभिभावक न हो- वैसे वक्त पर, पहुंच जाते और इत्मीनान से अपने पसंदीदा गाने सुनते थे। गाना कोई सा भी हो - अपने नियंत्रण में रखते हुए - गाना को बजाना, और उसके पीछे की तकनीक का अनुभव, एक बहुत ही आनंददायक अनुभव होता था।

उस ज़माने में, हमारे मोहल्ले की महिलाएं - चाचियाँ, भाभियाँ, माएं, फिक्स्ड डिपाजिट में बची-खुची सूद समेत वाली दादियाँ और नानियाँ - सब के सब दोपहर के समय सम्पूर्ण रूप से खाली बैठी होती थी। उनका सबसे प्रिय काम होता था - एक दूसरे के घर घूमने जैसा "समयकाटू" कार्यक्रम। हर महिला, या तो किसी मोहल्ले की महिला-सभा में शरीक होते थे अथवा अपने ही घर पर जमघट का प्रयोजन करते थे।

ऐसे कार्यक्रमों के तहत, बारी-बारी से किसी एक के घर पर - जिनको अक्सर हम सभी मास्टरनी या मुखियाइन की उपाधि दे दिया करते थे - मोहल्ले के - एक गुट की महिलाओं का, जमघट सा हो जाया करता था। वैसे जमघट में, किसी खास प्रकार के जटिल या विस्तृत आयोजन करने की कोई प्रथा नही होता था। बल्कि, गर्म चाय की, या फिर ठन्डे में - नीम्बू, शक्कर और घडे के पानी को मिला कर - "शरबत" पिलाने का ज्यादा प्रचालन था। शरबत, अक्सर बड़े से जग में, घोल कर बनाया जाता था। शक्कर घोलने का कार्यक्रम बहुत रोचक सा होता था। खास कर दूध के पतीले और जग में फेंटने का कार्यक्रम बहुत मज़ेदार होता था। उस क्रम में, पानी और शक्कर के घोल का छलक जाना बहुत सामान्य सी बात होती थी। जिसके आधे घंटे बाद, चहरों ओर बड़ी-बड़ी काली चींटियों का भ्रमण...! ऐसा लग रहा है, मानो मैं अभी समय के उस काल में वापस चला गया हूँ, और शरबत बना रहा हूँ!

एक और खास बात जो होता था वो है कि शरबत एक जग में और गिलास हाथ में लिए हम शरबत पिलाने जाते थे। अब तक तो ठीक है, आगे सुनिए।

बारी बारी से हरेक व्यक्ति के हाथ में शरबत का गिलास दिया जाता था। जिसको मिलता था वह इस तरह से शरबत के गिलास को हाथ में पकडते थे, मानो उन्हें अब आगे कोई काम सा करना हो - इस लिए गट्ट-गट्ट की आवाज करते हुए शरबत उसे खतम करना होता था। पीने वाले के पीने कि प्रक्रिया को अगली बारी आने वाले लोग बड़ी कातर दृष्टि से देखते रहते थे। वैसे गिद्ध नज़रों के पैनेपन के बीच शरबत के एक एक चुस्की का रसास्वादन करना बहुत जोखिम भरा काम होता था। अतः ज्यादातर लोग गटागट पद्धति का पालन करते थे। इसके बाद जूठे गिलास को शरबत से ही धोया जाता था, इतने आतिथ्य के बीच में अनेक सारे गिलासों को लाना या अलग से एक और जग में पानी लाना और उस से गिलास को धोने जैसा जटिल प्रक्रिया का सरलीकरण कर दिया गया था।

चूँकि शरबत से ही जूठे गिलास को साफ़ करने का कार्यक्रम होता था - जाहिर है, इस प्रक्रिया में शरबत का कम से कम ही नुकसान हो, इस खास बात का ख्याल रखते हुए गिलास धोने जैसे कार्य को भी काफी कंजूसी के साथ - कम से कम में काम चला कर यथोचित कर दिया जाता था।

परन्तु लोग भी शरबत पीने के कार्यक्रम को "आम से मतलब रखो और गुठली मत गीनो" के भावना से अधकचरे ढंग से धोये गिलास में ग्रहण करने को तैयार से होते थे। उनकी भावना सर्वथा यह होती थी कि - "व्यक्ति के बाहरी रूप पर नही बल्कि उनके अन्तःगुण पर जाओ"। शरबत को ग्रहण कर वे इस तरह के सारगर्भित विचारों को चरितार्थ करते थे। अतः, बिना किस और विचार के कि पिछला पीने वाला, आम के दातून से या नीम के दातून से दांत धोता हो, या टूथपेस्ट का इस्तेमाल करता हो, या फिर टूथ-ब्रश को - कागज के टुकडे में निकाले विको-वज्रदंती पाउडर - में ब्रश को छुआते हुए दाांत को साफ़ करता हो, ऐसे तुच्छ विचारों से वे ऊपर उठकर, चाणक्य नीति में बताये - "चांडालों से भी ज्ञान अर्जन में संकोच नही करना चाहिऐ" - ऐसे विचारों के अधीन होकर, बड़ी तत्परता से "गटागट शैली" में पूरे के पूरे गिलास के शर्बत को ग्रहण कर लेता था।

Thursday, November 22, 2007

जमशेदपुरिया - भाग ३

जमशेदपुर के लोगों के बारे में, मैंने तो पहले भी जिक्र किया है कि यह अपने आप में एक "सूक्ष्म भारत " है। हर प्रांत के लोग, यहाँ बहुत गर्व के साथ - जमशेदपुर-परिवार - की भावना के साथ रहते हैं। मैं जमशेदपुर में ही जन्मा हूँ और अपने शुरू के करीब ३० साल वहीं गुजारा हूँ। विगत ९ सालों से जमशेदपुर से अलग हूँ, पर शायद ही कोई ऐसा दिन गुजरता होगा, जब मैंने जमशेदपुर के बारे में नहीं सोचा होगा। मैंने जमशेदपुर में गुजारे, अपने कई सालों के अनुभव में, कभी ये नहीं पाया कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वो किसी भी प्रांत का हो, खुद को जमशेदपुर का नही मानता होगा।

वस्तुतः जमशेदपुर अपने आप में कुछ नहीं है बल्कि लोगों ने जमशेदपुर को एक शहर बनाया है। मैं जरा सा दार्शनिक सा लगूँगा पर जमशेदपुर के निर्माता श्री जमशेद जी नौसरवान टाटा ने शायद ऐसे ही शहर कि कल्पना कि थी और उसकी नींव आज से करीब सौ साल पहले डाली थी। लोग बड़े गर्व से कहते हैं कि वे जमशेदपुर के हैं। जमशेदपुरिया में इसी को कहेंगे - "हमलोकोन का जमशेदपुर"।

मैं अभी ६ महीने पहले जब जमशेदपुर में था, उस वक़्त अचानक से मुझे जमशेदपुर में काफी सारी कमियां या यूं कहिये उसके छोटे होने का अथवा समय के साथ शहर में आधुनिकतम सुविधाओं की कमी कह लीजिये, ऐसा लगने लगा। मगर जब मैं अपने वैसे दोस्तों से जो मेरे साथ टिस्को में अपना जॉब शुरू किये थे और अभी तक कार्यरत हैं, उन सबों ने उन्मुक्त भाव से मुझे अनेकानेक शब्दों और दलीलों से ये समझाने की भरसक कोशिशें की कि जमशेदपुर में वो सब सुविधाएं हैं जो होनी चाहिऐ। हालांकि ऐसा मैंने हर शहर में जब लोगों से मुलाक़ात की तो लोगों ने अपने शहर कि वैसी ही तारीफें की, बल्कि लोगों ने तो शहरों की कमियों को भी उसकी खासियत में तब्दील कर दिया - जैसे "छोटे शहर का एक फायदा है कि सब दुकानें और ऑफिस काफी करीब करीब होते हैं", परन्तु बताने वाले ये भूल गए कि उसके कारण यातायात की असुविधाएं और पार्किंग कि जगहों का न मिल पाना एक भयंकर समस्या बन गयी है। परन्तु मैंने  जब ऐसी बातें अपने दोस्तों से सूनी तो मुझे एक सुखद आश्चर्य हुआ कि जमशेदपुर में काम करने आने के पहले वी सब जमशेदपुर से बिल्कुल अनजान थे और ८-९ सालों में जमशेदपुर के वो बन गए ये एक अपने आप में अचरज की बात थी। मैं इस सोच में डूब गया कि कोई तो बात है जमशेदपुर में की यहाँ जो भी आया, वो ज्यादातर यहीं का हो जाता है, हालांकि आज के जमाने में जमशेदपुर जैसे शहर से ज्यादा चकाचौंध और सुविधाओं से भरी कितने सारे महानगर हैं, पर आज भी लोग यहीं रहना चाहते हैं। शायद ऐसे ही कारणों से हमारे और बाकी कई और परिवारों के पूर्वजों ने अपने अपने गाँवों या अन्य शहरों को छोड़ इस शहर को अपना घर बना लिया।

जमशेदपुर कि जो सबसे खास बात है वो है यहां की अनेक प्रकार की सुविधाएं। जमशेदपुर में खेल हो या पढाई, स्वच्छता की बात हो या नवीनतम सुविधाएं। हाल के दिनों तक जमशेदपुर कई मामले में देश के बाकी हिस्सों से काफी आगे रहता था। मसलन, हवाई उड्डयन शिक्षण केन्द्र या वृन्दावन के तर्ज पर जुबिली पार्क। पढाई के क्षेत्र में भी यह बाकी शहरों से काफी आगे रह चुकी है। इंजीनियरिंग, मेडिकल एवं उच्च शिक्षाओं के साथ साथ XLRI जैसे शिक्षा केन्द्र में प्रबंधन के क्षेत्र में शिक्षा की शुरुआत करना शायद जमशेद्पुर के नींव में टाटा प्रबंधन के सहयोग का स्वर्णिम उपलब्धि मानना पड़ेगा। हिंदी , अंग्रेजी माध्यम से ले कर करीब करीब हर क्षेत्रीय भाषाएं जैसे बंगला, उर्दू, उड़िया आदि में भी मैंने शिक्षण संस्थानों को देखा है। हालांकि आज के दिनों में शायद ही कोई अंग्रेज़ी के अलावा किसी और भाषा में शिक्षा के बारे में सोचता होगा, और शायद इस कारण से बाकी माध्यम लगभग बंद हो चुके हैं। मैं अपने आप को बहुत भाग्यशाली मानता हूँ की मेरी शिक्षा हिंदी माध्यम से हुई है और मेरी हिंदी इतनी प्रखर बनी वर्ना मैं एक बहुत ही बहुमूल्य धरोहर से वंचित रह जाता।

Tuesday, November 20, 2007

जमशेदपुरिया - भाग २

अगर आप जमशेदपुर के किसी नुक्कड़ पर खडे हों और दो चार कॉलेज के छात्रों का जमावाडा हो तो कुछ इस तरह के वार्तालाप का आप रसास्वादन कर सकते हैं :
( दृश्य कुछ ऐसा है कि अचानक से कोई एकाध हफ्ते बाद एक सदस्य फिर से अड्डा पर आया है और बाकी सदस्य गण उनसे जिज्ञासा कर रहे हैं)-
"का बे कहाँ गिया रा तुम इतना दिन से, दिखाई नई पड़ रा था, हमलोक को तुम कुछ बताया भी नई रहा ..."
वापस आया सदस्य -
"अबे हम तो हियाँयी पर तो था, खट्टा और मोटा को तो बोला रा ना कि हम अपना चाचा का घर जाएगा उलियान बस्ती में "

खट्टा और मोटा जैसे व्यक्ति विशेष हर अड्डे में पाए जाते हैं, खट्टा अवश्य कोई दक्षिण भारतीय होगा, जिनके भोजन में खट्टा ज्यादा होने कि वजह से वैसा नाम और मोटा नामक सदस्य हर अड्डा में सबसे ज्यादा मोटा दिखने वाले सदस्य के लिए सुरक्षित रखा जाता था। ये बात अलग है कि एक बार नाम पड़ जाने के बाद मोटा अगर सूख के काँटा भी क्यों न हो जाये, वह मोटा के नाम से ही संबोधित होता रहेगा।

ऐसा पूछना अनिवार्य नही है क्यूंकि अब इसे बदला नही जा सकता है, ना ही पूछने वाले को कोई जिज्ञासा है परन्तु बात को आगे बढाने कि लिए ऐसा करना आवश्यक होता है, अतः पुनः एक और प्रश्न -
"का करने गिया रा बे तुम हुवां?"
जैसा प्रश्न, वैसा ही बेरुखी से दिया गया उत्तर, परन्तु लौटा सदस्य तुरंत काम की बातें करता है -
"कुछ नई बे, ऐसी बउत दिन हो गिया रा ना, तो चले गिया रा, और बता क्या हुआ इधर, कोई नया सामान दिखा क्या तेरे लोक को?"

"समान" से तात्पर्य सुन्दर लड़की से है, जो हमेशा अड्डा का एक प्रमुख चर्चा का विषय होता है। एक तो एक सदस्य की कमी और तिस पर दुखती रग पर रखा हाथ, परन्तु अपने दुःख को व्यक्त करता -
"का बे हियां पर तो तेरे को मालूम ही है कि बेटा एक भी अच्छा चीज़ नई है, साला एक ठो है भी तो बेटा उसका पैंतरा बौत है..."

लौटा हुआ सदस्य बहुत ही बेचैनी से अपनी एक नयी खोज को तुरंत अपने बाकी मंडली के सदस्यों को अवगत करना चाहता है -
"अबे सुन, तेरे को एक ठो नया खबर सुना रा, तुम लोक गिया रा न बंटी का भइवा का शादी का पार्टी में, वहाँ देखा रा न बे एक ठो सोलिट चीज़, वो बेटा फिर से नज़र आया रा मेरे को २४ नंबर रोड में ..."

बाकी सदस्यों कि बेचैनी बढ़ चुकी है और वो तुरंत जानना चाहते हैं -
"कहाँ पर बे, बता न...साला बौत सोलिट गेम रा बे... "

"मालूम नई किसका घर में रहता है पर बेटा उसका साथ में साला पूरा फिल्डिंग है बे"

"अबे वो बिहारी-बंगाली का घर का पीछे में एक ठो लाल बुल्लेट वाला घर देखा है न, उधरी किधर तो जाते देखा रा वो दिन..मगर साला साथ में एक ठो ढाबुट और एक ठो बेटा छक्का जैसा लौंडा भी रा..."

जमशेदपुर में जब मैं रहता था, उस वक़्त टीवी का प्रभाव जरा जरा सा दिखने लगा था, बावजूद उसके, हर मोहल्ले के मैदान में, या फिर अड्डा पर जो अक्सर सड़क के किसी कोने पर बने कलवट पर जिसे जमशेदपुर कि भाषा में "पुलिया" कहते हैं उस पर युवा पीढ़ी आसन्न मिलते थे जिन्हें लोग "पुलिया-तोड़" कह कर पुकारते थे। ऐसी बातों का सिलसिला अनवरत ऐसे ही चलता रहता है। अगर आप जमशेदपुर में रहे होंगे तो शायद ज्यादातर बातें आपको समझ में आ गयी होगी, पर अगर आप कभी नही रहे हैं तो प्रयास करने कि आवश्यकता नही है, कारण इसमे बहुत सारे शब्दों कि आपको विशेष अर्थ पहले समझना पड़ेगा ।

Monday, November 19, 2007

जमशेदपुरिया - भाग १

जमशेदपुरिया भाषा और तौर तरीका अपने आप में एक बेमिसाल अनुभव है। पुलिंग अथवा स्त्रीलिंग का भेद - भाव हो या फिर एकवचन और बहुवचन का ख्याल, "जमशेदपुरिया वाद" ने इन सब व्याकरण के परिभाषाओं व परिपाटियों को अपने में सम्मिलित और समाहित कर एकाकार कर दिया है। "तेरा माँ आ रा है" या फिर "तेरा बाप आ रा है", इन दोनों वाक्यों में जमशेदपुरिया वाद के पुट हैं - पुलिंग और स्त्रीलिंग में कोई भेद नहीं है। बस का कन्डक्टर भी, उसी भाव में विभोर "रोकेगा एक लेडिच है" बोल बैठता था। वाक्य पर पुनः गौर करें - १ लेडीच - लेडीज़ - मतलब एक महिलाएं!

चेतावनी - जमशेदपुरिया में व्याकरण के बारीकियों में जाने का प्रयास भी न करें! यहाँ गइया - मतलब गाय, कभी चरता है या कभी "चर्र रा है" या फिर और भी संक्षिप्त में - "गैया चर्रा बे" !  किसी को पुकारने से कहता है - आर्रा बे - अर्थात, (मैं) आ रहा हूँ - एक तो, जम्सघेदपुर में - "मैं" शब्द का प्रयोग वर्जित सा है, और उसके बदले "हम" का प्रयोग होता है। वैसे ज्यादातर वाक्यों में, "हम" का भी उपयोग, नहीं के बराबर ही होता है - जैसे " कहाँ जार्रा बे?", "देख नई रा बे - खार्रा" आदि।

पढे-लिखे लोग हों या सब्जी बेचने वाला, कोई दक्षिण से आया हुआ हो या उत्तर भारत से - जमशेदपुर में, हर किसी की बोली एक जैसी और सब के सब अंततः जमशेदपुरिया में ही सम्मिलित हो जाते हैं । मेरी समझ से, जमशेदपुर भारत का एकमात्र ऐसा स्थान है जहाँ आप भारत के हर प्रांतों से आये लोगों के साथ हिल मिल कर रहते हैं।

 "जमशेदपुरिया व्याकरण" अथवा स्थानीय भाषा के विकास में सबों का उतना ही योगदान है, जैसे इन्द्रधनुष बनने में सातों रंगों का। चाहे कोई किसी भी प्रांत से आया हो, या किसी भी मातृभाषा का हो, हर कोई, "जमशेदपुरिया भाषा" में अपनी एक पहचान को पाता है। ये एक बहुत ही अनूठा संयोग है कि हर किसी ने, अपनी भाषा का प्रयोग करते रहने के साथ-साथ, हिंदी को भी अपना लिया, और इस तरह से हिंदी भाषा के - जमशेदपुरिया-संस्करण - के माध्यम से हिंदी भाषा को, एक बेमिसाल प्रारूप दे डाला।

अनेकों प्रयोग को संचालित करके, हिंदी को जन-मानस की भाषा बनाने के लिए, सरकार ने न जाने कितने करोड़ों रुपये और बरसों से अथक परियोजनाएं बनाई, पर वे अब तक पूर्णतः सफल नहीं हो पाये हैं। पर उसी उद्देश्य को पर्याप्त करने के लिए, जमशेदपुर शहर ने, हिंदी को लचीला बना कर - एक ऐसा माध्यम बना दिया, जिसे हर किसी ने अपने रूप से परिवर्तित करके  अपना लिया। दूसरा पहलू विचार योग्य, यह है कि जमशेदपुरिया  हिंदी भाषा में, आपको कहीं न कहीं, हर भाषा या प्रांत की छाप मिल जायेगी।

जमशेदपुर एक औद्योगिक शहर है जिसकी स्थापना करीब १९०७ के आसपास हुयी थी। उन शुरुआत के दिनों से ही, इस शहर में, देश के हर प्रान्त से, लोग आते गए और बसते चले गए।  इन करीब सौ साल के दरम्यान, हरेक प्रान्त के लोग - अपने भाषा, रहने के तौर- तरीको के अमिट-छाप को छोड़ते हुए- जमशेदपुर को, एक ऐसी सभ्यता, भाषा और रहन-सहन का तौर तरीका दिया है, जो बेमिसाल सा है! यहाँ पले-बढे लोगों में, दूसरों के रहन-सहन, तौर-तरीके, खान-पान आदि का बहुत अच्छा ज्ञान और सम्मान होता है - साथ ही वे बहुत सहिष्णु से होते हैं, और या तो दूसरों के तौर तरीके की कोई परवाह नहीं करते या उनकी इज़्ज़त करते हैं। ये बहुत आम बात सी थी कि जब कभी हम, अपने किसी मित्र के घर जाते थे - उनके घर में, बिलकुल एक अलग भाषा में बात की जाती थी - जो हमारे समझ से कोसो दूर से थे - बावजूद इसके, जब कभी हमारे मित्र हमसे बातें करते- वो होता था एक शुद्ध - जमशेदपुरिया हिंदी - समझ रा न बे - चल बेटा, तेरे को आगे का बात समझा रा है!

जमशेदपुरिया भाषा का एक अनुभव, आप तब कर सकते हैं, जब रेल से सफर करते हुए टाटानगर रेलवे स्टेशन पहुंच रहे हों। जैसे जैसे ट्रेन जमशेदपुर के रेलवे स्टेशन के आस पास आने लगती है, आप अचानक से रेल के डिब्बे में जमशेदपुरिया भाषा का प्रयोग अनुभव करेंगे -
"अबे सुन्न बे, साला जुगसलाई पार हो गिया बे, अपना गोदाम नीचे ले आ बे..."
इस तरह के वाक्यों का अर्थ समझने के लिए आपको जमशेदपुरिया से अवगत होना ही पड़ेगा।

अनेक अशुद्धियों के बावजूद, जब आप एक दूसरे से मिलेंग,  तो आपकी जुबान पर बरबस ही जमशेदपुरिया आ जाएगा। मैंने कई बार अनुभव किया है कि लोगों से बोलचाल के दौरान, अगर आप बहुत शुद्ध हिंदी भाषा का प्रयोग करने का प्रयास करेंगे, तो आप स्वयं ही झेंप जायेंगे। इसके बाद आप स्वयं ही - वापस वैसी ही भाषा का प्रयोग करेंगे - जैसी आपसे - आपके सामने खड़ा व्यक्ति अपेक्षा कर रहा है - मतलब विशुद्ध - जमशेदपुरिया!

बचपन में, मैं घर में बोले जाने वाले हिंदी और पुस्तकों में प्रयोग होने वाले हिंदी के विरोधाभास से, विचिलित तो था ही, परन्तु बहुत दिनों तक. मैं घर के बाहर बोलचाल की भाषा के अशुद्धता एवं अजीबोगरीब शब्दों के प्रयोग को, कतिपय लोगों के हिंदी मातृभाषा न होने की वजह समझता रहा।

शुरुआत के दिनों में, मैंने ये मान लिया था कि शायद मेरे इर्द-गिर्द रहने वाले लोग, दक्षिण एवं बंगाल के साथ साथ स्थानीय आदिवासी प्रभुल के थे, अतः उन लोगों ने अपनी बोली वैसी बना ली होगी और हिंदी का एक नया रुप को अपना लिया था। परन्तु, धीरे-धीरे मुझे समझ में आने लगा कि मैं बहुत अनजान था, कारण मेरे अंतर्मन में जमशेदपुरिया भाषा ने अपना जगह बना लिया था, परन्तु मैं उससे अनभिज्ञ उसे अब तक एक परिपक्व भाषा शैली के रूप में उसी तरह से स्वीकार नही किया था - जैसे विश्व ने अब तक भारत को संयुक्त राष्ट्र का स्थाई सदस्य नहीं माना है। हालांकि, कुछेक शब्दों के अर्थ समझने के लिए तो मुझे करीब १८-२० सालों की प्रतीक्षा करनी पडी- क्योंकि ज्यादातर इस तरह के शब्दों का उद्गम स्त्रोत हिंदी नहीं होता था। मसलन, क्रिकेट खेलते समय, अक्सर हम एक शब्द का प्रयोग किया करते थे - "हॉस्पिटल २ रन" ।

इसे समझाने के पहले, जैसे परिवेश में हम क्रिकेट खेलते थे मुझे पहले उसका विवरण देना पड़ेगा। हम अक्सर, घर के बाहर बने बागान या गली में खेलते थे। ऐसे जगहों पर लोगों के स्कूटर या "खटिया" इत्यादि जैसे अनेकानेक वस्तुएं रखे होते थे। फलस्वरूप, इन वस्तुओं से गेंद के टकरा जाने के बाद, गेंद किसी भी कोने या ऐसे जगह जा सकती थी जहाँ से गेंद को निकाल कर लाना, आसान नही होता था - कम से कम क्षेत्ररक्षण से - कोसों दूर का मामला सा होता था!  इसके आलावा, अक्सर गेंद, इन सामग्रियों में, विलुप्त भी हो जाती थी।

ऐसी परिस्थिति में, गेंद को खोजने में समय व्यतीत करने के प्रयास में, दो बातें होने की पूरी गुंजाईश थी - एक तो यह, कि आपाधापी में, समान के तितर-बितर होने के साथ-साथ सूख रहे आचार के "बोइयाम"- बरनी आदि जैसे कांच के सामग्रियों के टूटने की पूरी गुंजाईश होती थी! और, दूसरा यह कि हमें क्रिकेट के नियम कानून का, इतना ज्ञान अवश्य हो गया था कि जब तक गेंद बाउंड्री लाइन के बाहर नही जाती हो, और ऎसे स्थिति में जब तक फील्डर के द्वारा, गेंद वापस गेंदबाज के हाथ में नही आ जाती, गेंद "डेड" नहीं मानी जाती है। इस प्रकार से, क्रिकेट के अजीबोगरीब नियम के तहत, ऐसे मौक़े पर बल्लेबाज दौड़-दौड़ कर पचासों रन बना सकता है। शायद एकाध बार खेलते समय, हमें ऐसा कटु अनुभव हो चुका था अथवा हमारे पहले के पीढ़ी के अनुभव के इनसाइक्लोपीडिया के संग्रह से - प्राप्त ज्ञान सा था, जिसका तकाजा था कि हमारे क्रिकेट के नियम कानून में, इस नए नियम -"हॉस्पिटल २ रन"- का इजाफा कर दिया गया था। इस कानून का मतलब यह होता था कि अगर गेंद वैसे किसी जगह पर चल जाये, तो ज्यादा परिश्रम कि आवश्यकता नहीं है - और एक पूर्व-निर्धारित रन दे दिया जाएगा।

क्रिकेट के नियमों के इस संशोधन का, हमारे मोहल्ले के क्रिकेट पर, बहुत दूरगामी प्रभाव पड़ा। अब न ही बल्लेबाज को बार-बार दौड़ कर, रन लेने जैसा उबाऊ काम करना पड़ता था, और न ही फील्डिंग टीम को, ज्यादा परेशान होने की आवश्यकता होती थी। जैसा खेल के प्रारंभ में ही निर्णय ले लिया जाता था, ऐसे शॉट खेलने के लिए एक पूर्व-निर्धारित रन - आमतौर पर २ या ३ रन- दे दिया जाता था।

नियम की तो बात ठीक थी, परन्तु इस शब्द का अर्थ, मुझे बहुत बाद में समझ में आयी। ये गुत्थी तब सुलझी, जब मैं एक बार अंग्रेज़ी के "ओब्स्टकल" शब्द से, अपने बचपन के तार को जोड़ा। हॉस्पिटल  शब्द, वैसे काफी करीब सा था- obstacle - शब्द के! मगर किसे क्या फर्क पड़ता था, एक दूसरे को अपने क्रिकेट के नियमों को समझाने के लिए, कोई सा भी शब्द माध्यम बन सकता था - हॉस्पिटल हो या ऑब्सटिकल - क्या फर्क पड़ता था?

अब तक तो आपको काफी अंदाज़ लग गया होगा कि जमशेदपुरिया एक भाषा मात्र ही नही है। ये अपने आप में एक स्थान-विशेष की विविधताएँ को साथ-साथ लिए, बहुत सारे विशेष प्रकार के अनुभवों को भी सिमटे हुए, जमशेदपुर की एक पहचान सी बन गया है।

जमशेदपुरिया - एक ऐसा सागर है, जहाँ  छोटी-बड़ी, बरसाती-सदाबहार और अन्य अनेकानेक प्रकार की नदियों का संगम होता है। देश के लगभग हर प्रान्त के खान-पान और रहन-सहन को मिला कर, जमशेदपुरिया  बना है - जिसका एक अलग सा, अपना ही पहचान है, और अनेको रंग के मिल जाने पर, इसका एक नया - अनूठा सा रंग बन गया है।

बिहारीलाल के दोहे में, जिस तरह से - "गागर में सागर" की संज्ञा दी जाती है , जमशेदपुर का रहन-सहन लगभग उसी का प्रतिरूप है। मैं अगले ब्लॉग में, अपने बचपन से बड़े होने के क्रम में संकलित ,जमशेदपुर के कुछ अनुभवों के साथ-साथ जमशेदपुरिया में प्रयोग होने वाले, कुछ अनूठे शब्दों का संकलन भी पेश करूँगा ।
(क्रमशः)